Search
Close this search box.

हिंदी-राजभाषा-भारतीय भाषाएँ 

👇खबर सुनने के लिए प्ले बटन दबाएं

हिंदी-राजभाषा-भारतीय भाषाएँ 

 

प्रिय मित्र,

 

मैं किसी संगठन से नहीं हूँ और न हिंदी संबंधित किसी औपचारिक पद, ज़िम्मेदारी आदि से कोई सम्बन्ध रहा है। एक सामान्य पत्रकार रहा हूँ जिसने ९-१० साल अंग्रेज़ी पत्रकारिता के बाद स्वेच्छा से लगभग ३५ वर्ष हिंदी के अख़बारों, पत्रिकाओं और चैनलों में काम किया है। इस समूह में कई मित्र मुझसे और मेरे विचारों से परिचित हैं। हिंदी मेरी आजीविका नहीं प्रेम है। भारतीय भाषाओं का संरक्षण और संवर्धन मेरा जुनून है।

 

मुझे दुख है कि मेरी संक्षिप्त टिप्पणी में आपको हिंदी के प्रति बेरुख़ी लगी। असंख्य हिंदी/राजभाषा सम्मेलनों में भागीदारी करने का सौभाग्य मिला है। संयोग है कि आपसे भेंट नहीं हो सकी वरना आपको बेरुख़ी नहीं उसका उलटा दिखता। ख़ैर।

 

मैं यथार्थवादी और व्यावहारिक हूँ। हिंदी और सभी भाषाओं के लिए समर्पित होने के बावजूद बहुत ऊँची-ऊँची, लच्छेदार, अलंकारिक, मीठी और भावुक बातों से बचता हूँ। मेरा मानना है कि इन सदाशयी भावुकताओं से हिंदी का नुक़सान ज़्यादा किया है फ़ायदा कम।

 

इस चर्चा में में ही कई मित्र हिंदी/राजभाषा कर्मियों के कामकाज, प्रभाव, व्यवहार और आंतरिक यथार्थ पर पर्याप्त टिप्पणियाँ कर चुके हैं।

 

सारे विश्व हिंदी सम्मेलनों, राजभाषा आयोजनों, दिवसों-सप्ताहों-पखवाड़ों-मासों के राष्ट्रीय-स्थानीय उत्सवों, उनपर विशाल व्यय और श्रम का हिंदी की वास्तविक स्थिति-प्रगति पर कितना-कैसा प्रभाव पड़ा है इससे आप सब मुझसे अधिक ही परिचित होंगे। ७५ वर्षों के बाद क्या हिंदी संविधान में कल्पित-लक्षित स्थिति को प्राप्त कर पाई है?

 

राजभाषा की कार्यालयीन प्रगति के तिमाही-वार्षिक आँकड़ों की वास्तविकता पर आप सबके बीच कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है। उनसे ३५ साल से मैं भी अवगत हूँ।

 

केंद्रीय हिंदी समिति सहित हिंदी से संबंधित उच्चतम स्तरों पर भागीदारी का अनुभव हासिल कर चुका हूँ।

 

देश में सामाजिक, शैक्षिक, प्रशासनिक, नीति निर्माण क्षेत्रों में आज हिंदी कहाँ है इसकी कोई गंभीर, उच्चस्तरीय समीक्षा नहीं की गई है। हिंदी ही क्यों सभी भाषाओं के बारे में यह समीक्षा नियमित रूप से होनी चाहिए। कितनी और कहाँ होती है?

 

हर भारतीय भाषा दशकों से अंग्रेज़ी के बढ़ते दुर्दांत प्रभाव से आक्रांत है, साहित्य और वोट की राजनीति को छोड़कर हर महत्वपूर्ण क्षेत्र में पिछड़ रही है क्या यह हमें नहीं दिखता? आपके-हमारे घरों में, हमारे बच्चों में हिंदी/अपनी-अपनी भाषाओं के प्रति प्रेम, लगाव, गौरव, आकर्षण और व्यवहार कितना-कैसा है क्या हम सचमुच नहीं जानते? हमें नहीं दिखता?

 

कितने हिंदी साहित्यकार, राजभाषा कर्मी, शिक्षक, मेरे जैसे पत्रकार और हिंदी प्रेमी-सेवी कह सकते हैं कि वे अपने घरों और बच्चों में हिंदी/भाषा के प्रति रुचि तथा व्यवहार बढ़ा पाए हैं? हममें से कितनों के बच्चे हिंदी/भाषा के गंभीर पाठक-लेखक हैं?

 

भाषा और उसकी गति-प्रगति-वर्तमान-भविष्य-विकास तथा गतिकी (dynamics) एक अत्यंत जटिल विषय है। हम अपनी क्षमता-रुचि-सुविधा के अनुसार उनको सरल बना लेते हैं। संसार भर में, प्रत्येक जीवन्त भाषा में इन प्रश्नों पर गंभीर मंथन और विमर्श, शोध, चिंतन-लेखन चल रहा है। भाषा कर्मी होने के कारण हमें उनसे परिचित होना चाहिए। केवल हिंदी-हिंदी के जाप से, भावुक गौरव गान से हम उसका कल्याण नहीं कर पाएँगे।

 

हिंदी को आत्म गौरव, राष्ट्र गौरव का आधार बनाने का नारा आकर्षक और प्रभावशाली लगता है लेकिन इन दोनों बड़े प्रत्ययों की गहराई में गए बिना सिर्फ़ नारा ही बन सकता है। ११० वर्षों से हिंदी के नारों, उद्गारों, उद्धरणों से क्या हासिल हुआ है इसे हम ईमानदारी से परखने और यथार्थ का सच्चा आकलन करने का साहस कब दिखाएँगे?

 

हर व्यक्ति को अपनी भाषा से एक सा लगाव और गौरव होता है। केवल हिंदी को आत्म गौरव और राष्ट्र गौरव का आधार कहने, नारा बनाने का अहिंदीभाषियों पर कैसा प्रभाव होगा, उनमें हिंदी के प्रति कितना सम्मान और प्रेम उपजेगा इसपर हमें विचार करना चाहिए। यहाँ उपस्थित सभी लोग सीधे सीधे हिंदी से जुड़े हैं इसलिए इस तरह की बातें हमें सहज-स्वाभाविक लगती हैं। लेकिन हमारी ज़िम्मेदारी अहिन्दीभाषियों को हिंदी के क़रीब लाने की है, उनमें हिंदी के लिए लगाव पैदा करने की है। इसलिए उनमें अपनी-अपनी भाषा के प्रति प्रेम-गौरव के भाव को स्वीकार और पुष्ट करते हुए ही हम हिंदी का काम कर सकते हैं।

 

बच्चे ऊँचे उपदेशों से नहीं रोचकता से आकर्षित-प्रभावित होते हैं। हिंदी को हम उनके लिए आकर्षक, रोचक और अपनी कैसे बनाएँ इसके रचनात्मक तरीक़े खोजना हम सबका असली दायित्व है।

 

हिंदी साहित्य और फिल्में, नाटक, गीत इसमें हमारी सहायता कर सकते हैं। यह पीढ़ी तो वैसे भी उपदेशों, निर्देशों और थोपी गई चीजों से दूर भागने वाली है। पुराने तौर तरीक़ों से हमारा काम नहीं चलेगा।

हमें नई भाषा, मुहावरों, शैलियों और रणनीतियों को तैयार करना होगा।

यह मेरी विनम्र राय है। मेरी बात से आपको और अन्य मित्रों को यदि पीड़ा पहुँची है तो क्षमा माँगता हूँ। आशा है मेरा आशय कुछ स्पष्ट हुआ होगा।

धन्यवाद

——————————-

मुख्यतः राजभाषा अधिकारियों के समूह में आज लिखी टिप्पणी।

-राहुल देव, वरिष्ठ पत्रकार के फेसबुक वॉल से साभार।

READ MORE