जनजातीय समाज भारत अध्ययन का जरूरी पक्ष, हमें उन्हें मुख्यधारा में लाने की नहीं, उनसे सीखने की जरूरत : डॉ. सत्यप्रिय पाण्डेय
वाराणसी। 21 अगस्त 2026
जनजातीय समाज भारत अध्ययन का कोई हाशिए का विषय नहीं, बल्कि भारत को समग्रता में समझने के लिए उसका एक जरूरी और अनिवार्य पक्ष है। भारतीय संस्कृति की पूर्णता की बात जनजातीय समाज की संस्कृति, लोकज्ञान, कला-कौशल, परंपराओं और लोकचेतना को समझे बिना नहीं की जा सकती। आवश्यकता जनजातीय समाज को मुख्यधारा में लाने की नहीं, बल्कि उनकी जीवन-दृष्टि से सीखने और उनकी तरह प्रकृति, समाज और जीवन के प्रति संवेदनशील होने की है। यह विचार कार्यशाला में प्रथम वक्ता के रूप में हिन्दी विभाग, श्याम लाल कालेज, नई दिल्ली के विद्वान डॉ. सत्यप्रिय पाण्डेय ने व्यक्त किया।
भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला ‘भारत अध्ययन की परंपरा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएँ’ के अंतर्गत ‘भारत में जनजातीय समाज : संस्कृति, लोकज्ञान और जीवन-दृष्टि’ विषय पर व्याख्यान देते हुए डॉ. पाण्डेय ने कहा कि किसी भी देश की संस्कृति किसी एक वर्ग, जाति, समुदाय या संप्रदाय की देन नहीं होती। उसमें विभिन्न समाजों की संस्कृति, कला, कला-कौशल, परंपराओं और जीवनानुभव का योगदान होता है। इसलिए जनजातीय समाज को छोड़कर भारतीय संस्कृति की पूर्णता की बात करना संभव नहीं है।
उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज भारत की प्राचीन सांस्कृतिक स्मृति और ज्ञान-परंपरा का महत्वपूर्ण वाहक रहा है। ‘जन’ वैदिक परंपरा का महत्वपूर्ण शब्द है और जनजातीय समाज को केवल पिछड़ेपन या दूरी के संदर्भ में देखने के बजाय उसके अपने सांस्कृतिक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार भारतीय ऋषि-मुनियों ने वन और प्रकृति के निकट रहकर ज्ञान की साधना की, उसी प्रकार जनजातीय समाज ने भी वन, प्रकृति और अपने परिवेश से गहरा ज्ञान अर्जित किया तथा उसे अपनी परंपराओं, गीतों, कथाओं और कला-कौशल में संरक्षित किया।
रामकथा में शबरी और कोल-भीलों के प्रसंग का उल्लेख करते हुए डॉ. पाण्डेय ने कहा कि भारतीय परंपरा में जनजातीय समाज की उपस्थिति केवल कथा का हिस्सा नहीं है, बल्कि वह भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि में उसकी प्रतिष्ठा को भी दर्शाती है। शबरी की निष्कपटता, विनम्रता, प्रेम और सहज भक्ति को उन्होंने जनजातीय समाज की बड़ी शक्ति बताया। उन्होंने कहा कि बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों की उपस्थिति के बावजूद राम द्वारा शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया जाना भारतीय परंपरा में भक्ति और मानवीय गुणों की महत्ता को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि रामचरितमानस में आदिवासी विमर्श को गंभीरता से देखने की आवश्यकता है। शबरी और कोल-भीलों के प्रसंग बताते हैं कि भारतीय आख्यान-परंपरा में जनजातीय समाज को केवल दया या सहानुभूति के पात्र के रूप में नहीं, बल्कि अपने विशिष्ट गुणों और सांस्कृतिक सामर्थ्य के साथ प्रस्तुत किया गया है।
जनजातीय प्रकृति-चेतना पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज प्रकृति से केवल संसाधन प्राप्त नहीं करता, बल्कि प्रकृति के साथ जीता है। वृक्ष, जल, जंगल, पशु-पक्षी और भूमि उसके जीवन और संस्कृति का हिस्सा हैं। उन्होंने शकुंतला को ‘प्रकृति-पुत्री’ और जनजातीय समाज को ‘प्रकृति-पुत्र’ की संज्ञा देते हुए कहा कि आधुनिक समाज को प्रकृति के साथ जनजातीय समाज के संबंध से सीखने की आवश्यकता है।
उन्होंने कर्मा गीतों का उल्लेख करते हुए कहा कि जनजातीय गीतों में उनका पूरा जीवन सुरक्षित है। जनजातीय समाज में गीत और संगीत की विविधता अत्यंत व्यापक है और अनेक प्रकार के पारंपरिक वाद्य उनकी विकसित कला-कौशल परंपरा के प्रमाण हैं। उन्होंने जनजातीय समाज के अध्ययन में वेरियर एल्विन के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि जनजातीय गीतों, संगीत और लोकपरंपराओं पर गंभीर अध्ययन किया जाए तो एक जीवन भी कम पड़ सकता है।
डॉ. पाण्डेय ने कहा कि भारतीय ज्ञान-परंपरा के अध्ययन में ऋषियों के ज्ञान-विज्ञान और योगदान पर काफी चर्चा हुई है, लेकिन अब यह भी गंभीर शोध का विषय होना चाहिए कि जनजातीय समाज ने ज्ञान, विज्ञान, संगीत, कला, कृषि और तकनीकी कौशल के क्षेत्र में क्या योगदान दिया। उन्होंने कहा कि जनजातीय ज्ञान को केवल लोकविश्वास या लोकाचार के रूप में सीमित करना उसके वास्तविक महत्व को कम करना होगा।
गोंड समाज की कथाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने राजा पेमल साह की कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि विपत्ति में सब कुछ नष्ट हो जाने के बाद रानी ने अपने भाई के भंडार से अन्य संपत्ति लेने के बजाय एक बूढ़ा बैल और गाय मांगी। जनजातीय विश्वास में बूढ़े देव का संबंध बैल से माना जाता है। इन्हीं पशुओं के माध्यम से खेती शुरू हुई और धीरे-धीरे खोई हुई संपत्ति वापस प्राप्त हुई। डॉ. पाण्डेय ने इसे जनजातीय जीवन में श्रम, कृषि, पुरुषार्थ और पुनर्निर्माण की शक्ति का प्रतीक बताया।
उन्होंने कहा कि जनजातीय साहित्य केवल अभाव और पीड़ा का साहित्य नहीं है, बल्कि वह पुरुषार्थ को स्थापित करने वाला साहित्य है। संकट में रोने के बजाय श्रम और आत्मविश्वास से जीवन को पुनः खड़ा करना उसकी महत्वपूर्ण जीवन-दृष्टि है।
गोंडों की वीरता और ऐतिहासिक चेतना का उल्लेख करते हुए डॉ. पाण्डेय ने गोंड राजाओं की राजनीतिक और सैन्य शक्ति पर चर्चा की। उन्होंने मंडला और गोंड राजाओं के इतिहास तथा मुगलों के साथ हुए संघर्षों का उल्लेख करते हुए कहा कि जनजातीय समाज को केवल जंगलों में रहने वाले समुदाय के रूप में देखना उसके ऐतिहासिक योगदान को कम करके देखना है। गोंड लोकगीतों और कथाओं में युद्ध, स्वाभिमान, वीरता और अपने देवताओं से सहायता की प्रार्थना की स्मृतियाँ आज भी संरक्षित हैं।
उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज की एक बड़ी शक्ति उसकी मिथकीय चेतना है। आल्हा-उंदल जैसे वीर-देवताओं, शिव-पार्वती से संबंधित लोकविश्वासों तथा सती-दक्ष प्रसंग के जनजातीय रूपांतरण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि लोकसमुदाय केवल प्राप्त मिथकों को दोहराता नहीं, बल्कि उन्हें अपनी सामाजिक संवेदना और जीवनानुभव के अनुरूप पुनः रचता और नए अर्थ प्रदान करता है।
मुसहर समाज और ‘सीला-लवनी’ की चर्चा करते हुए उन्होंने जनजातीय और वंचित समुदायों के जीवन में अभाव, श्रम और कृषि से जुड़े अनुभवों की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि किसी समुदाय की सामाजिक संरचना को समझने के लिए उसकी आर्थिक और जीवन-परिस्थितियों को भी समझना जरूरी है। लोक के शब्दों और परंपराओं के पीछे उसके जीवन का वास्तविक इतिहास छिपा होता है।
वीरभोर समुदाय से जुड़ी हनुमान की लोककथा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जनजातीय लोककथाएँ रामकथा जैसे व्यापक भारतीय आख्यानों में भी अपने पात्रों और प्रसंगों को जोड़ती रही हैं। इससे भारतीय संस्कृति के भीतर विभिन्न लोक और जनजातीय परंपराओं के बीच हुए निरंतर संवाद का पता चलता है।
उन्होंने विशेष रूप से कहा कि “कथा जनजातियों का प्राण-तत्व है।” जनजातीय कथाओं में वनस्पतियों, वृक्षों, पशु-पक्षियों और मनुष्य के बीच संबंधों का गहरा ज्ञान मिलता है। अनेक कथाओं में फूल, वृक्ष, बाघ और अन्य जीव मानवीय रूप ग्रहण करते हैं। यह उस जीवन-दृष्टि का संकेत है जिसमें मनुष्य और प्रकृति के बीच कठोर विभाजन नहीं है।
विभिन्न जनजातीय और पौराणिक परंपराओं में नाग, असुर, राक्षस और मनुष्य के बीच विवाह एवं सांस्कृतिक संबंधों के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए डॉ. पाण्डेय ने कहा कि भारतीय आख्यानों में अनेक समुदायों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान के प्रमाण मिलते हैं। इसलिए भारतीय संस्कृति को किसी एकरैखिक या एकरूपी परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि अनेक धाराओं के समन्वय के रूप में देखना चाहिए।
डॉ. पाण्डेय ने जोर देकर कहा कि जनजातीय समाज को ‘मुख्यधारा में लाने’ की भाषा पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, “हमें उन्हें मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता नहीं है, हमें उनकी तरह होने की जरूरत है।” उनके अनुसार प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, सामुदायिकता, निष्कपटता, श्रम, पुरुषार्थ, लोकचेतना और जीवन के प्रति सहज दृष्टि जैसे गुण आज के समाज के लिए सीखने योग्य हैं।
उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज भारतीय संस्कृति का दर्शक या परिधि पर खड़ा समुदाय नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के निर्माण में सक्रिय योगदान देने वाला समाज है। भारत अध्ययन तभी पूर्ण हो सकता है जब शास्त्रीय परंपराओं के साथ लोक और जनजातीय ज्ञान-परंपराओं का भी गंभीर अध्ययन किया जाए।
कार्यक्रम में ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यम से बड़ी संख्या में प्रतिभागियों ने सहभागिता की। डॉ. पाण्डेय ने आयोजन के लिए समन्वयक एवं आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि भारत अध्ययन के व्यापक विमर्श में जनजातीय समाज को स्थान देना भारतीय संस्कृति को समग्रता में समझने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
द्वितीय वक्ता के रूप में ‘आर्य समाज और भारत का सांस्कृतिक पुनर्जागरण’ विषय पर व्याख्यान देते हुए आर्य समाज के प्रसिद्ध आचार्य डॉ. ज्वलंत कुमार शास्त्री ने कहा कि भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण को केवल धार्मिक सुधार के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा, सामाजिक समरसता, शिक्षा, आत्मसम्मान और राष्ट्रीय चेतना के व्यापक जागरण के रूप में देखने की आवश्यकता है।
डॉ. शास्त्री ने कहा कि भारत अध्ययन का उद्देश्य भारत को केवल बाहर से प्राप्त विवरणों के आधार पर समझना नहीं, बल्कि उसकी अपनी ज्ञान-परंपरा, ग्रंथों, सामाजिक अनुभवों और सांस्कृतिक चेतना के आधार पर समझना है। इस दृष्टि से उन्नीसवीं शताब्दी का भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। राजा राममोहन राय से आरंभ हुई सुधारवादी चेतना को महर्षि दयानंद सरस्वती ने वैदिक आधार देते हुए व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप दिया। महर्षि दयानंद सरस्वती ने भारतीय समाज को उसकी मूल वैदिक चेतना से जोड़ने के साथ-साथ सामाजिक विषमता और रूढ़ियों के विरुद्ध भी व्यापक संघर्ष किया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक पराधीनता के उस दौर में भारत के सामने केवल विदेशी शासन की चुनौती नहीं थी। समाज के भीतर भी अनेक ऐसी रूढ़ियाँ और विकृतियाँ विकसित हो गई थीं, जो भारतीय संस्कृति के मूल मानवीय स्वर से मेल नहीं खाती थीं। दयानंद सरस्वती ने इन विकृतियों की समीक्षा के लिए वेदों को आधार बनाया और ‘वेदों की ओर लौटो’ का आह्वान किया।
डॉ. शास्त्री ने कहा कि दयानंद का सबसे महत्वपूर्ण योगदान ज्ञान के सार्वजनीकरण का था। वेद किसी एक वर्ग की निजी संपत्ति नहीं हैं। वैदिक परंपरा में ज्ञान को व्यापक समाज तक पहुँचाने की भावना रही है। उन्होंने महिलाओं तथा समाज के व्यापक वर्गों को वेदाध्ययन का अधिकार देने की वकालत की। वैदिक साहित्य में ऋषिकाओं की परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जिस परंपरा में महिलाएँ ज्ञान की सर्जक रही हैं, उसमें उन्हें ज्ञान से वंचित करने का कोई औचित्य नहीं हो सकता।
उन्होंने बताया कि आर्य समाज ने शिक्षा को सांस्कृतिक जागरण का प्रमुख माध्यम बनाया। विद्यालयों, गुरुकुलों और शिक्षण संस्थाओं के माध्यम से वैदिक ज्ञान तथा आधुनिक शिक्षा को समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँचाने का प्रयास हुआ। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार और बंगाल सहित अनेक क्षेत्रों में इस शैक्षिक आंदोलन का प्रभाव पड़ा।
डॉ. शास्त्री ने कहा कि दयानंद और आर्य समाज का सामाजिक सुधार केवल बाल-विवाह, अनमेल विवाह, सती-प्रथा और अन्य रूढ़ियों के विरोध तक सीमित नहीं था। दलितोद्धार और सामाजिक समरसता भी उनके कार्य का महत्वपूर्ण पक्ष था। उन्होंने ऐसी परिस्थितियों में काम किया जब दलित समुदाय के लोगों को शिक्षा, सार्वजनिक संसाधनों और सामाजिक जीवन से दूर रखा जाता था।
उन्होंने कहा कि आर्य समाज के कार्यकर्ताओं को सामाजिक रूढ़ियों के समर्थकों के विरोध का भी सामना करना पड़ा। दलित बस्तियों में जाना, उनके बीच शिक्षा का कार्य करना, विद्यालय खोलना, उनके साथ भोजन करना और उन्हें सार्वजनिक कुओं से पानी लेने का अधिकार दिलाने जैसे कार्य उस समय सामाजिक दृष्टि से अत्यंत साहसिक थे। इन प्रयासों का उद्देश्य केवल किसी समुदाय का उद्धार करना नहीं, बल्कि समूचे भारतीय समाज में सामाजिक समानता और आत्मसम्मान की स्थापना करना था।
डॉ. शास्त्री ने कहा कि आर्य समाज ने जातीय पहचान से जुड़े सामाजिक भेदभाव को कम करने का भी प्रयास किया। अनेक क्षेत्रों में लोगों को जातिसूचक उपाधियों के स्थान पर ‘आर्य’ जैसे व्यापक सामाजिक संबोधन अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। इससे सामाजिक पहचान को जन्माधारित विभाजन से ऊपर उठाकर एक व्यापक सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने का प्रयास हुआ।
उन्होंने कहा कि भारत की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक संघर्ष का परिणाम नहीं थी। इसके पीछे लंबे समय तक चला सांस्कृतिक और सामाजिक जागरण भी था। जिस समाज के बड़े हिस्से को शिक्षा और सम्मान से वंचित रखा गया हो, उसे स्वतंत्रता के लिए एकजुट करना संभव नहीं था। इसलिए दलितोद्धार, महिला शिक्षा, सामाजिक समरसता, स्वदेशी और वैदिक ज्ञान का प्रसार—ये सभी राष्ट्रीय जागरण की व्यापक प्रक्रिया के अंग थे।
डॉ. शास्त्री ने स्वदेशी और आत्मनिर्भरता के संदर्भ में भी महर्षि दयानंद के विचारों को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि अपने देश की वस्तुओं, अपनी भाषा, अपनी शिक्षा और अपनी ज्ञान-परंपरा के प्रति सम्मान का भाव राजनीतिक स्वतंत्रता की मानसिक भूमि तैयार करता है। दयानंद ने भारतीयों में यह विश्वास जगाने का प्रयास किया कि भारत अपनी ज्ञान-परंपरा और सामाजिक शक्ति के आधार पर स्वयं अपना भविष्य निर्धारित कर सकता है।
उन्होंने कहा कि दयानंद सरस्वती का सांस्कृतिक पुनर्जागरण अतीत की अंधस्वीकृति नहीं था। वे परंपरा के भीतर आई विकृतियों को चुनौती देते थे और मूल वैदिक दृष्टि के आधार पर समाज का पुनर्निर्माण करना चाहते थे। इसलिए उनके चिंतन में धार्मिक सुधार, शिक्षा, सामाजिक समरसता, महिला अधिकार, दलितोद्धार, स्वदेशी और राष्ट्रीय चेतना एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। भारत अध्ययन की दृष्टि से दयानंद सरस्वती का महत्व इसी समग्रता में है। उन्होंने भारत को उसके अपने ज्ञान-स्रोतों के आधार पर समझने का आग्रह किया और भारतीय समाज को यह आत्मविश्वास दिया कि अपनी संस्कृति पर गर्व करना और अपनी संस्कृति के भीतर मौजूद विकृतियों का विरोध करना परस्पर विरोधी नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि आर्य समाज ने भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण को सामाजिक धरातल प्रदान किया। वेदों और भारतीय ज्ञान-परंपरा को समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँचाने, शिक्षा का विस्तार करने, सामाजिक भेदभाव को चुनौती देने और राष्ट्रीय आत्मसम्मान जगाने की प्रक्रिया ने आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन के लिए अनुकूल मानसिक और सामाजिक वातावरण तैयार किया।
डॉ. ज्वलंत कुमार शास्त्री ने कहा कि भारत अध्ययन के संदर्भ में दयानंद सरस्वती को केवल धार्मिक सुधारक के रूप में देखना उनके व्यापक योगदान को सीमित करना होगा। वे भारतीय ज्ञान-परंपरा के पुनर्पाठ, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय आत्मबोध के ऐसे चिंतक थे, जिनका प्रभाव आधुनिक भारत के सांस्कृतिक निर्माण तक दिखाई देता है।












