हमारे पाँव का काँटा हम ही से निकलेगा…
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बीएनएमयू, मधेपुरा में यह मेरा दसवां स्वतंत्रता दिवस समारोह था। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि मैं विश्वविद्यालय आयोजित मुख्य ध्वजारोहण कार्यक्रम में शामिल नहीं हुआ। लेकिन मैंने विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त शिक्षक संघ, शिक्षक संघ तथा कर्मचारी संघ द्वारा आयोजित ध्वजारोहण कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति सुनिश्चित की।
सेवानिवृत्त शिक्षक संघ के नवनिर्वाचित महासचिव सह विश्वविद्यालय के पूर्व निर्वाचित सीनेटर प्रो. अरविंद कुमार ने इशारों में ही सही, लेकिन विश्वविद्यालय की बदहाली को रेखांकित कर अपनी जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन किया। आपके प्रति बहुत-बहुत आभार।
शिक्षक संघ में लंबे समय से महासचिव की भूमिका निभाते आ रहे प्रो. अशोक कुमार ने अपने संबोधन में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता बचाओ आंदोलन के कार्यक्रमों की जानकारी दी, लेकिन वे विश्वविद्यालय के संबंध में एक शब्द भी नहीं बोले। जाहिर है कि हमारे बूढ़े हो चुके नेतृत्व में भी इतनी संवेदनशीलता आवश्यक बची हुई है कि वह उच्च पदाधिकारी के कसीदे पढ़ने को तैयार नहीं है। आज के दौर में यह भी कोई कम बड़ी बात नहीं है।
कर्मचारी संघ के अध्यक्ष श्री पृथ्वीराज यदुवंशी जी ने अपनी पीड़ा को बखूबी व्यक्त किया। आगे आशा है कि वे ‘संघ’ के माध्यम से अपने सभी सदस्यों को इस पीड़ा से निकालने का सार्थक उपक्रम भी करेंगे।
कुल मिलाकर मुझे अपने शिक्षकों के दोनों संघों के कार्यक्रम में शामिल होकर काफी संतोष मिला। आज मेरा यह विश्वास दृढ़ हुआ है कि तमाम कमियों एवं कमजोरियों के बीच ‘संघ’ का महत्व बरकरार है और इसके माध्यम से ही सुधार की उम्मीद बची हुई है।
यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि आज यदि ‘संघ’ निष्प्रभावी नजर आ रहा है, इसका यह कतई मतलब नहीं है कि ‘संघ’ अप्रासंगिक हो गया है। यह महज इस बात का सबूत है कि ‘संघ’ के पदाधिकारीगण ‘संघ’ के कार्यक्रमों एवं उद्देश्यों से कुछ इतर ‘व्यावसायों’ को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं और हम सदस्यगण भी अपने नेताओं के भरोसे निष्क्रिय होकर बैठ गए हैं।
संक्षेप में, हमें मिल-जुलकर अपने ‘संघ’ को मजबूत करना होगा और अपनी समस्याओं के समाधान हेतु स्वयं आगे आना होगा। सुप्रसिद्ध शायर डॉ. राहत इंदौरी के शब्दों में, “ना हमसफ़र, ना किसी हमनशी से निकलेगा, हमारे पाँव का काँटा हम ही से निकलेगा।”
(नोट : इस बार स्वतंत्रता दिवस समारोह काफी फिका रहा। हमारे मन में फोटोग्राफी का कोई उत्साह नहीं था। इसके बावजूद यदि आपको नि:स्वार्थ भाव से हर परिस्थितियों में प्रेम एवं सम्मान देने वाला कोई प्रिय (बिमल) भाई मिल जाए, तो मुरझाए चेहरे पर भी थोड़ी-सी मुस्कान आ ही जाती है।)














