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एक पुस्तक जिसने धारणा बदल दी

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एक पुस्तक जिसने धारणा बदल दी
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पिछले एक सप्ताह से डाॅ श्रीभगवान सिंह की सस्ता साहित्य मंडल से प्रकाशित पुस्तक ‘डाॅ राजेंद्र प्रसाद:देशरत्न से भारतरत्न बनने की दास्तान ‘पढ रहा था।आज पूर्णाहुति हुई।ग्यारहवीं कक्षा में अंग्रेजी की एक पाठ्यपुस्तक हुआ करती थी-The Good and the Great’इसमें राजेंद्र प्रसाद की एक संक्षिप्त जीवनी थी।बी ए की कक्षा में पहुंचा तो राजेंद्र बाबू की आत्मकथा पढी।फिर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जाना हुआ जहां हिन्दी साहित्य में नेहरू युग की अवधारणा देने वाले आचार्य विराजमान थे।भगवान जी ने उन्हीं आचार्यप्रवर के निर्देशन में पी एच डी उपाधि हेतु ‘हिन्दी साहित्य और नेहरू ‘ विषयक शोध प्रबंध प्रस्तुत किया।राजेंद्र प्रसाद अलक्षित रहे।अपन राम की क्या बिसात!ऊपर उल्लेखित जानकारी के सिर्फ दो स्त्रोत।क्राॅस रेफरेंस में बातें आती गई और राजेंद्र प्रसाद की एक दकियानूस छवि बनती गई। लेकिन इस पुस्तक को पढने के बाद राजेंद्र बाबू के बारे में पूर्व निर्धारित धारणा एकदम बदल गई है और पं जवाहरलाल नेहरू का कद थोड़ा छोटा हो गया है।महत्वपूर्ण जानकारी मिली कि पं नेहरू अलोकतांत्रिक तरीके से प्रधानमंत्री बने,जबकि राजेंद्र प्रसाद लोकतांत्रिक तरीके से राष्ट्रपति बने। राजेंद्र बाबू को लेकर पं नेहरू के मन में एक ग्रंथि थी।वे राष्ट्रपति के विदेशी सरोकारों एवं आंतरिक सक्रियताओं को सीमित करते रहे।उनकी अंतिम यात्रा में स्वयं तो अनुपस्थित रहे ही,तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ राधाकृष्णन को भी मनाही करते रहे।यद्यपि इसमें वे सफल नहीं हुए। हिन्दी साहित्य में नेहरू युग के खोजी भगवान जी राजेंद्र बाबू के कर्तृव का उत्खनन करते करते भाव विभोर होकर नेहरू युग को राजेंद्र युग कहने की प्रस्तावना करते हैं जो सर्वथा उचित ही है।

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राजकीय डिग्री महाविद्यालयों में पुराने अंगीभूत महाविद्यालयों / विभागों से प्रतिनियोजित किए गए सभी शिक्षकों (प्रभारी प्रधानाचार्यों के अतिरिक्त) को अपने-अपने पूर्व प्रतिनियोजित / पदस्थापित महाविद्यालयों / विभागों में योगदान के निमित तत्काल प्रभाव से स्वतः विरमित

लेट्स इंस्पायर बिहार के अंतर्गत लिटरेरी चैप्टर द्वारा अंगिका एवं हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ अमरेंद्र की पुस्तक “सवालों के घेरे में डॉ अमरेंद्र: साक्षात्कार समग्र” का भागलपुर में लोकार्पण सह विचार गोष्ठी

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