मेरे द्वारा पढ़ी गई पुस्तक
पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक “मजबूती का नाम महात्मा गांधी” कई अलग-अलग खंडों में विभाजित एक अत्यंत पठनीय पुस्तक है। उनकी पुस्तकों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी भूमिका होती है। भूमिका ही पाठक को यह स्पष्ट संकेत दे देती है कि लेखक आगे क्या कहने जा रहे हैं। इससे पहले मैंने उनकी “कौन है भारत माता” भी पढ़ी है। उसकी भूमिका भी उतनी ही प्रभावशाली और विचारोत्तेजक लगी थी।
अब इस पुस्तक की बात करें। इसमें कुल छह अध्याय हैं। “मजबूती का नाम महात्मा गांधी” तथा “ईश्वर सत्य है या सत्य ही ईश्वर है” जैसे अध्यायों में लेखक ने गांधी के विचारों की अत्यंत गहन और प्रभावशाली व्याख्या की है।
मैं लंबे समय से गांधी–गोरा संवाद को पढ़ने और समझने का प्रयास कर रहा था। इस पुस्तक में “निराशावादी की नैतिकता : गांधी–गोरा संवाद” शीर्षक से पूरा अध्याय इसी विषय को समर्पित है। इसमें अनेक प्रसंगों में लेखक ने यह भी दिखाया है कि गांधीजी कई मुद्दों पर गोरा की बातों से सहमत दिखाई देते हैं। पुस्तक का अंतिम अध्याय “जे पीर पराई जाने रे” गांधी के महात्म्य और उनके मानवीय पक्ष की विस्तृत चर्चा करता है।
कुल मिलाकर यह छह अध्यायों की एक गंभीर, विचारोत्तेजक और अवश्य पढ़ी जाने योग्य पुस्तक है।
पुस्तक का यह अंश विशेष रूप से उल्लेखनीय है—
“संगठित और सोद्देश्य हिंसा असल में इकबाल का मामला है। हिंसा की सजेस्टिव पावर महत्वपूर्ण होती है। और गांधी की मजबूती की बात जब हम करते हैं, तो एक बहुत सीधी-सी बात हमारे सामने आती है। गांधीजी की लाखों असफलताओं की चर्चा की जा सकती है। उनके बहुत-से काम विवादास्पद रहे हैं। इतने लंबे सार्वजनिक जीवन में विवाद होना स्वाभाविक भी है। लेकिन संभवतः गांधीजी का घोर विरोधी और कटु आलोचक भी इस बात से इनकार नहीं करेगा कि गांधीजी ने साम्राज्यवादी सत्ता की हिंसा की सजेस्टिव ताकत, उसके इकबाल को समाप्त कर दिया। उन्होंने हिंसा की उस ताकत को तोड़ दिया।” — इसी पुस्तक से।
वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. मनोज मिता जी के फेसबुक वॉल से साभार।













