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कविता/ बरसाते रहो/ डाॅ. कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’

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अंध-श्रद्धा प्रेम मेरा, कुछ नेह बरसाते रहो।
जेठ सा जीवन तपा, मधुमास तुम आते रहो।
मधुमास तुम आते रहो…
विकल है- मन की नदी, बहुत सागर दूर है।
पलकों से- इसकी राह के कंकर हटाते रहो।
मधुमास तुम आते रहो…
जग में सच्चा प्यार ना, कोई ऐसा ना कहे।
आशा ओढ़ो, कल्पना संग सुर मिलाते रहो।
मधुमास तुम आते रहो…
घर ये तेरा- ना है मेरा, वृथा वाद-विवाद है।
चार दिन ही साथ हैं- प्रेमपथ पग बढ़ाते रहो।
मधुमास तुम आते रहो…
ओढ़ कर बैठे हो काहे, तुम दुशाले पर दुशाले?
काल-काल बन मुस्का रहा, अब अहं हटाते रहो।
मधुमास तुम आते रहो…                                डॉ कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’

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