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कविता/ गुम गया लोकतंंत्र/ प्रो. (डॉ.) प्रेम प्रभाकर हिंदी विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर (बिहार)

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कविता/ गुम गया लोकतंंत्र
———————–

मुल्क की सियासत
मानो एक गुम रास्ता
जिस पर चल रहे सियासतदां
आड़े-तीरछे, उड़ते-गोते खाते
जैसे वे एक शिकारी हों
शायद, इसीलिए
लोकतंत्र बन गया
उसका सहज शिकार
मगर,
हमारे सोचने वाले भी तो
बैठ गये होकर मौन
मानो वे घुन्ने घोड़े हों
ऐसे में, आम आवाम क्या करे
अपनी-अपनी ज़िन्दगी ढोती
जी रहे हैं वे
लथपथ-लथपथ-लथपथ।

मज़ाहिब अब
मुहब्बत और मिल्लत नहीं सिखाते
हर पल, हर छिन
वे फैलाते हैं
नफरत-नफरत-नफरत।
वे कहते: हमारी हुकूमत मान
वरना दंगा को कैसे रोक सकेंगे हम
जनता की आस्था का सवाल है
कानून से उसे नहीं दबाया जा सकता
इन धर्मों के ध्वजाधारियों के पास
होती हैं ऐसी बंदूकें
जिनसे सिर्फ और सिर्फ निकलती हैं
साम्प्रदायिकता की गोलियां
गोलियां-गोलियां-गोलियां।

शायद, सारी हुकूमतों का
एक ही मकसद रह गया है शेष
कि आदमी और समाज के
शोषण-दमन का
बस! चलता रहे खेल,
खेल-खेल-खेल।
जनता न कर सके
कभी दिन में आराम
न ले सके रात में चैन
वे सोचे नहीं, हम हैं, न !
मैं सोचता हूं
कि गर जन सजग हो गया तो?
तो? तो? तो? क्या?
सत्ता के लिए न हो जाएगा
सबसे बड़ा खतरा
खतरा-खतरा-खतरा!

इन हालातों को देखकर
भारत के भाल पर
उभरता है एक विकराल प्रेत
जिसकी चोटी मानो कुत्ते की दुम
दाढ़ी जैसे सियार की जीभ
टोपी जैसे गिद्ध की आंखें
गो कि देश को नोच रहीं
दाढ़ी, चोटी, टोपी
टोपी-टोप-टोपी।

मादरेवतन के मर्दाने बेटों–
मजदूरों, किसानों, कारीगरों समेत
तमाम मेहनतकशों, दलितों और अकलियतों–के रोज-ब-रोज
हो रहे हैं कत्ल
रिस रहें खून
टप-टप-टप।
चाट रहे हैं रक्त उनके
साम्प्रदायिक धनपशु भेड़िए
वे सत्ता की सड़क पर
सरपट दौड़ रहे,
अट्टहास लगा रहे
और राजपथ पर
पसर रहे ‘विश्व बाज़ार’!

टोपी गिद्ध बन गई है
वह जम्हूरे की तरह बोलने लगी है:
”मेहरबां!कद्रदां!!”
कतारों में खड़े होने लगे
चापलूस, भगत, प्रशासक, गुलाम, पूंजीपति, ठेकेदार, घोटालेवाज, खानदार, मालदार…
इधर कुछ बुद्धिजीवी, चिन्तक, कलाकार, कलमकार भी भज रहे हैैं:
ग्रामशी, देरिदा, रोलाबार्थ।

कल तक समता विरोधी झुंड में
भूंक रहे थे कुत्ते
किन्तु,
आज काले-सफेद साफे बांधे बराबरी और आजादी की मुखालिफत करने वे
भेड़ियों के जत्थे की तरह
बढ़ रहे हैं
मानो बदलाव के शेर से
नहीं हो उन्हें डर
यों भी शेर नहीं खाता कुत्ते को
मगर,
यह भी सूर्य की मानिंद सत्य है
कि स्वान नहीं हो सकता सिंह।

किन्तु, दु:स्वप्न-सा यह दृश्य
क्यों उभर रहा…
कि स्वान-समूह में से
किसी ने काट खाया है
लंगड़ाती राजनीति के अश्व का मुख
सिंहासन लड़खड़ाया और
लुढ़क गया घोड़ा
मानो उसे कुत्ते ने नहीं,
गेहुंवन ने डंस लिया हो!
——————————

संपर्क :

पी-7, प्रोफेसर्स क्वार्टर्स, विश्वविद्यालय आवासीय परिसर,
लालबाग-सराय,
भागलपुर-812002 (बिहार)

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