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वीगन जीवनशैली सर्वोत्तम*

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*वीगन जीवनशैली सर्वोत्तम*

भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा की राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) एवं वीगन आउटरीच संस्था के संयुक्त तत्वावधान में फूड, प्लानेट एंड हेल्थ विषय पर एक ऑनलाइन वेबिनार का आयोजन किया गया। इसमें वैश्विक पर्यावरण की वर्तमान स्थिति, भोजन की आदतों का पर्यावरण, स्वास्थ्य एवं पशु-पक्षियों पर प्रभाव, जलवायु परिवर्तन एवं जैव-विविधता विनाश जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।

इस अवसर पर मुख्य वक्ता वीगन आउटरीच संस्था के कोऑर्डिनेटर अभिषेक दूबे ने बताया कि हमारा भोजन केवल हमारे स्वास्थ्य से ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और जीव-जंतुओं के जीवन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। इसलिए हमें अपने भोजन के प्रति हमेशा सजग रहना चाहिए।

उन्होंने बताया कि पौध आधारित वीगन जीवनशैली हमारे लिए सर्वोत्तम है। एक संतुलित पौध आधारित भोजन हमारे स्वस्थ जीवन के लिए पर्याप्त है, हमें पशु उत्पादों की जरूरत नहीं है। वीगन जीवनशैली अपनाकर हम पर्यावरण असंतुलन को भी ठीक कर सकते हैं। इससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, जैवविविधता विनाश, जंगलों की कटाई और जल में प्रदूषण व उसकी बर्बादी को कम किया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि पशु उत्पाद हैं एंटीबायोटिक रजिस्टेंस का बड़ा कारण हैं‌। मांस, डेयरी, अंडा, मछली उत्पादन में एंटी-बायोटिक्स का बड़ा प्रयोग होता है। मांस, डेयरी, अंडा, मछली को छोड़कर और शुद्ध पौध आधारित भोजन अपनाकर हम टाइप टू डायबिटीज, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, कैंसर, मोटापा आदि के खतरे काफी कम कर सकते हैं और अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकते हैं।

*सभी जीवों के अधिकारों का हो संरक्षण*
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पशु पक्षियों में भी हमारी तरह ही व्यक्तित्व, भावनाएं, संवेदना, परिवार होता है। ईश्वर या प्रकृति ने उन्हें भी आज़ादी से जीवन जीने का अधिकार दिया था, जो हमने उनसे छीना है। हमें सभी जीवों के प्राकृतिक अधिकारों का सम्मान एवं संरक्षित करना चाहिए।

*प्रकृति की ओर लौटना हमारी मजबूरी*
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए समन्वयक डॉ. सुधांशु शेखर ने कहा कि आधुनिक विकास की अंधदौड़ में हम प्रकृति- पर्यावरण से दूर होते जा रहे हैं। इससे हमारे अस्तित्व पर ही गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। अतः मानव सभ्यता को बचाने के लिए प्रकृति की ओर लौटना हमारी मजबूरी हो गई है।

उन्होंने कहा कि भौतिकवाद एवं उपभोक्तावाद ने मानव-जीवन को जटिल बना दिया है। इससे हमारा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य भी कुप्रभावित हो रहा है और दुनिया की शांति भंग हो गई है। ऐसे में दुनिया भारतीय सभ्यता-संस्कृति एवं दर्शन की ओर आशा भरी निगाहों से देख रही है। हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा बताए गए सादगी एवं संयम के मार्ग पर चलने से ही हमारा जीवन सही अर्थों में सुखमय हो सकेगा।

*छोटे-छोटे प्रयासों का भी है महत्व*
सहरसा जिला नोडल पदाधिकारी शशिकांत कुमार ने बताया कि कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य छात्रों एवं समाज में यह संदेश देना कि व्यक्तिगत स्तर पर छोटे-छोटे प्रयासों का भी महत्व है। हम छोटे-छोटे प्रयासों से भी अपने स्वास्थ्य एवं पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं।

कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने अपने प्रश्न पूछे और विशेषज्ञ द्वारा उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया गया। सभी प्रतिभागियो को ई. प्रमाणपत्र भी प्रदान किए गए।

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