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राज्य के नवसृजित 208 स्नातक स्तरीय (डिग्री) महाविद्यालयों में दर्शनशास्त्र विषय में पद-सृजन एवं नियुक्ति के संबंध में।

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सेवा में,
माननीय मुख्यमंत्री महोदय
बिहार सरकार, पटना।

विषय : राज्य के नवसृजित 208 स्नातक स्तरीय (डिग्री) महाविद्यालयों में दर्शनशास्त्र विषय में पद-सृजन एवं नियुक्ति के संबंध में।

महोदय,
सविनय निवेदन है कि बिहार सरकार द्वारा राज्य की उच्च शिक्षा को सुदृढ़ एवं व्यापक बनाने के उद्देश्य से 208 नए स्नातक स्तरीय (डिग्री) महाविद्यालयों की स्थापना का निर्णय अत्यंत ही ऐतिहासिक, दूरदर्शी एवं सराहनीय कदम है। यह निर्णय न केवल शिक्षा के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है, बल्कि बिहार की गौरवशाली दार्शनिक ज्ञान परम्परा,सांस्कृतिक विरासत एवं बिहार के चहुमुखी विकास की दृष्टि से भी अत्यंत स्वागतयोग्य है।

जहाँ विज्ञान एवं तकनीकी मानव जीवन को उन्नति के साधन प्रदान करते हैं, वहीं दर्शनशास्त्र मानव जीवन को दिशा, दृष्टि एवं मूल्य प्रदान करता है। बिहार प्राचीन काल से ही दार्शनिकों, चिंतकों एवं साधकों की पुण्यभूमि रहा है। बुद्ध, महावीर,राजा जनक, याज्ञवल्क्य,गार्गी, मैत्रेयी, भारती,मंडन मिश्र,गंगेश उपाध्याय,वाचस्पति मिश्र, स्वामी सहजानंद सरस्वती तथा जयप्रकाश नारायण जैसे महान विभूतियों की चिंतनधारा ने न केवल बिहार, बल्कि सम्पूर्ण विश्व को वैचारिक दिशा प्रदान की है।
बिहार की इस दार्शनिक-वैचारिक थाती का प्रतिस्मरण करते हुए एक बेहद जरूरी तथ्य को आपके संज्ञान में लाना आवश्यक समझते हैं, वह यह कि नवसृजित स्नातक स्तरीय (डिग्री)महाविद्यालयों में प्रस्तावित विषयों एवं पद-सृजन की सूची में जाने-अनजाने दर्शनशास्त्र जैसे महत्वपूर्ण विषय की उपेक्षा की गई है। यदि नवसृजित महाविद्यालयों में दर्शनशास्त्र विषय के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था नहीं होगी, तो बिहार की युवा पीढ़ी नैतिक मूल्यों, तार्किक चिंतन, मानवीय संवेदनाओं एवं समृद्ध भारतीय दार्शनिक ज्ञान परंपरा से वंचित हो जाएगी। महान अर्थशास्त्री कौटिल्य ने भी दर्शनशास्त्र/ तर्कशास्त्र को सभी विधाओं का दीपक कहा है।

UNESCO ने भी World Philosophy Day के माध्यम से दर्शनशास्त्र को मानव समाज के नैतिक, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विकास के लिए अनिवार्य माना है। भारत सरकार द्वारा भी भारतीय दार्शनिक दिवस मनाए जाने को बढ़ावा दिया जा रहा है। आज योग विद्या का अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार, बौद्ध दर्शन एवं जैन दर्शन की वैश्विक स्तर पर बढ़ती प्रासंगिकता इस विषय के महत्व को और अधिक प्रमाणित करती है। यदि उच्च शिक्षा संस्थानों से दर्शनशास्त्र जैसे मूलभूत एवं मूल्यपरक विषय को दूर रखा जाएगा, तो हमारी युवा पीढ़ी आलोचनात्मक विवेक, दार्शनिक पहचान एवं सांस्कृतिक मूल्य दृष्टि से विमुख हो सकती है। राज्य के सभी परम्परागत विश्वविद्यालयों में स्नातक एवं स्नातकोत्तर तथा इंटरमीडिएट में दर्शनशास्त्र का मूल विषय के रूप में अध्ययन-अध्यापन हो रहा है।राष्ट्रीय शिक्षा नीति – 2020 में दर्शनशास्त्र के विषय-वस्तु को विशेष महत्व दिया गया है। अवधेय है कि जिस बिहार ने विश्व को ज्ञान, तर्क और चिंतन की दिशा दी तथा दर्शनशास्त्र को “मदर ऑफ ऑल साइंसेज” के रूप में प्रतिष्ठित किया, वहाँ इस विषय की उपेक्षा राज्य की गौरव-गरिमा के अनुकूल नहीं होगी।

अत: निवेदन है कि बिहार की गौरवशाली विरासत, राज्य की बौद्धिक अस्मिता , बिहार की समृद्ध दार्शनिक ज्ञान परंपरा एवं समाज पर पश्चिमीकरण के बढ़ते दुष्प्रभावों को ध्यान में रखते हुए नवसृजित 208 स्नातक स्तरीय ( डिग्री) महाविद्यालयों में दर्शनशास्त्र विषय के अध्यापन हेतु सहायक प्राध्यापक का पद सृजन एवं नियुक्ति सम्बन्धी सकारात्मक एवं संवेदनशील निर्णय लेने की महती कृपा करें।

भवदीय
अखिल भारतीय दर्शन परिषद एवं दर्शन परिषद, बिहार

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