रघु राय नहीं रहे. यह दुखद खबर कल मिली थी. बात, किशोरावस्था से युवा होने के दिनों की है. उन्हीं दिनों उन्हें पहली बार देखा था. 1973 के अंत या 1974 के आरंभ में. तब, छात्र के रूप में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) गया ही था. 1974 आंदोलन के शुरूआती दौर में. जयप्रकाश जी की पहल पर, बिहार आंदोलन से जुड़े लगभग दो दर्जन युवा नेताओं (जो किसी दल से जुड़े नहीं थे) के लिए एक विशेष प्रशिक्षण शिविर आयोजित हुआ था. जेपी के अपने गांव, सिताबदियारा वाले उनके घर पर. जेपी ने अपने घर के बगल में ही, सर्वोदय (सर्व सेवा संघ) को कुछ जमीन दी थी. उस पर दो—तीन भवन बने थे. एक खपड़ैल घर. लोगों और आगंतुकों-अतिथियों के ठहरने के लिए.दूसरा, एक हॉलनुमा भवन. इसके बगल में एक छोटी सी खादी की दुकान थी. इसी हॉल में यह तीन दिवसीय प्रशिक्षण शिविर आयोजित था.
इस शिविर में संवाद व चर्चा के लिए बतौर प्रशिक्षक, जेपी ने देश के जाने—माने बौद्धिक चिंतकों को न्यौता था. मकसद, बिहार आंदोलन के होनहार और प्रतिभावान नेताओं का श्रेष्ठ बौद्धिक चिंतकों से संवाद हो सके. गवर्नेंस पर, नीतियों पर, गांधीवाद पर, वैचारिक सवालों पर, अलग—अलग राजनीतिक दर्शनों या वादों पर. शिविर में प्रो. नागेश्वर लाल (गांधीयन स्टडीज सेंटर, राजघाट, वाराणसी), जाने-माने पत्रकार और तब के लोकप्रिय अखबार ‘जनवार्त्ता’ के संपादक श्यामा प्रसाद प्रदीप (जो बाद में उत्तर प्रदेश में जेपी आंदोलन के संयोजक बने), प्रो कृष्णनाथ (काशी विद्यापीठ, वाराणसी के अर्थशास्त्र के प्राध्यापक व समाजवादी दार्शनिक-चिंतक) समेत पटना, दिल्ली वगैरह से जानेमाने बुद्धिजीवी आये थे. दियारे या गांव की कठिन यात्रा कर. पहली बार इन सबको अपने गांव में ही देखा. इसी शिविर में. इस आयोजन के प्रशिक्षण कक्ष में आमंत्रित लोगों को ही बैठने की अनुमति थी. बाहर से दरवाजा बंद हो जाता था. ताकि सार्थक-गंभीर व बिना व्यवधान चर्चा हो सके. पर, उसी गांव का होने के कारण हमें यह छूट या सुविधा थी कि इसमें बैठ, सुन सकूं. दोनों दिन रहा.
जाने—माने फोटोग्राफर रघु राय को पहली बार वहीं देखा. इसी आयोजन में. पर, चिंतन शिविर के संवाद कक्ष में वह मौजूद नहीं थे. उसमें सिर्फ संवाद के लिए न्योते गये प्रशिक्षक और प्रशिक्षणार्थी ही मौजूद थे. हमारे जैसे दो-चार लोग गांव से थे. संवाद के दौरान एक प्रसंग में जेपी ने हस्तक्षेप किया. उन्होंने शिव और भस्मासुर का प्रसंग सुनाया. भोजनावकाश हुआ. सब लोग हॉल से बाहर निकले. भारी भीड़ थी. रघु राय भी बाहर थे. जेपी ने रघु राय से कहा, अच्छा हुआ, आप संवाद के दौरान अंदर नहीं थे. हमने भस्मासुर का प्रसंग सुनाया और शिव ने कैसे भस्मासुर को अपने माथे पर हाथ रखने को प्रेरित किया था, वह संकेत में कर दिखाया-बताया भी. आप होते तो उसे कैमरे में कैद कर लेते. जेपी ने रघु राय से सहज उत्फुलता में यह बात कही. रघु राय ने तुरंत कहा, एक बार फिर कर के दिखाइए सर ! जेपी ने हंसते हुए बात टाल दी.
रघु राय ने सिताबदियारा में अनेक तस्वीरें ली. उनमें से अनेक तस्वीरें रघु राय की चर्चित पुस्तक ‘बिहार शोज द वे’ में संकलित—प्रकाशित हैं.
इसके बाद एक तस्वीर ने रघु राय को रातों—रात देश में जनप्रिय, लोकप्रिय व परिचित नाम बना दिया. वह तस्वीर थी, बिहार आंदोलन के दौरान पटना में जमीन पर गिरे जेपी पर एक जवान पुलिस अधिकारी की तनी लाठी. तस्वीर तब के प्रसिद्ध अंग्रेजी अखबार ‘ द स्टेट्समैन’ के पहले पन्ने पर छपी. इस एक तस्वीर से देश की राजनीति में नयी हलचल मच गयी. संसद से सड़क तक. बाद में वे तस्वीरें, जेपी द्वारा संपादित पत्रिका ‘एवीरमैन’ में सिलसिलेवार विस्तार से छपी.
जेपी पर लाठीचार्ज की इस तस्वीर का हम युवाओं पर जादुई असर था. 1942′ आंदोलन के नायक पर, आजाद भारत में उठी लाठी. बूढ़े और अशक्त दिख रहे, जमीन पर गिरे जेपी पर तनी लाठी. एक तसवीर का असर कैसा होता है, यह आज भी हम सबकी स्मृति में है. एक तस्वीर कितने शब्दों, लेखों, किताबों पर भी भारी पड़ती है, यह तभी समझा था.
उसी तस्वीर को देखकर डॉ धर्मवीर भारती (जो बाद में हमारे पहले संपादक बने) की कविता आई, ‘मुनादी’. यह कविता, तब हिंदी की श्रेष्ठ पत्रिका ‘कल्पना’ में छपी. इस कविता की मार्मिक व संवेदनशील भाषा, कथ्य और भाव ने इसे घर—घर पहुंचा दिया. रघु राय की तस्वीर से जब ‘मुनादी’ की मर्म-वेदना-व्यंग्य भरे शब्दों का मिलान हुआ, तो लोकमानस पर उसके जादुई असर को भी हमारी पीढ़ी ने देखा.
कई दशकों बाद, दो वर्ष पहले रघु राय से दिल्ली में एक मित्र के घर पर मुलाकात हुई. हमने उन्हें ये प्रसंग याद दिलाये. उन्होंने हमारे गांव सिताबदियारा की तबकी कठिन यात्रा के पुराने संस्मरण सुनाये. चंद्रशेखर जी की भी बहुत चर्चा की. उनकी ली तस्वीरों के बारे में बताया. बिस्मिल्ला खां समेत भारत के श्रेष्ठ कलाकारों पर उनकी फोटोग्राफी सीरीज, जिसकी चर्चा दुनिया भर में होती है, उसके बारे में बताया. फोटोग्राफी कला को रघु राय जी ने उस शिखर पर पहुंचाया, जहां शब्द उनकी उपलब्धियों और प्रतिभा को बयां नहीं कर सकते. दो साल पहले उनके जीवन पर किताब आई, ‘ रघु राय: वेटिंग फॉर डिवाइन’. इस किताब की लेखिका हैं, रचना सिंह. पुस्तक को पढ़ा. रघु राय की जीवन यात्रा, कला यात्रा से जुड़े अनेक अनसुने प्रसंगों को जाना. उनकी प्रेरक स्मृति को प्रणाम. विनम्र श्रद्धांजलि.
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Photo courtesy : Raghu Rai’s Facebook
राज्यसभा के माननीय उपसभापति श्री हरिवंश जी के फेसबुक वॉल से साभार।














