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मिथिलांचल का लोकपर्व ‘चौरचन’/कलंकमुक्त होने का पर्व

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वैदिक काल से ही मिथिलांचल अपनी सभ्यता, संस्कृति व पर्व-त्योहारों की परंपरा से प्रसिद्ध रहा है। प्रसिध्द लोकपर्व चौठ चंद्र मिथिलांचल में 16वीं शताब्दी से ही भाद्रपद मास शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि को विधि-विधान के साथ मनाया जाता है। ऐसी मान्यताएं है कि चौठ चंद्र व्रत की उपासना करने से मनोकामना पूर्ण होती है। इस पर्व को मिथिला में चौरचन भी कहा जाता है।

इस दिन व्रती निर्जला उपवास रखती हैं। शाम को घर के आँगन या छत पर मिट्टी या गाय के गोबर से नीप कर पीठार से अरिपन (कच्चे चावल को पीसकर बनाई जाने वाली रंगोली) बनाया जाता है। पूजा सामग्रियों, और कई तरह के पकवान जिसमें पूड़ी, खीर, पिरुकिया, खाजा, लड्डु, कई तरह के फल, दही इत्यादि को अरिपन पर सजाया जाता है। वैदिक मंत्रोच्चार के साथ विधिपूर्वक पूजा किया जाता है।
“नमः सिंह प्रसेन मवधित सिंहो जाम्बवताहतः सुकुमारक मारोदीह तव व्येषस्यमंक” इस मंत्र के साथ चंद्रमा की आराधना की जाती है, और हाथ में उठाकर चंद्रमा का दर्शन किया जाता है।
स्कन्द पुराण में भी चौठ-चंद्र पर्व की पद्धति व कथा का वृहत वर्णन किया गया है। वेद शास्त्रों के अनुसार इस तिथि को चंद्रमा का दर्शन अशुभ माना गया है। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीगणेश का जन्म हुआ था। ज्योतिष शास्त्र में भी श्रीगणेश को चतुर्थी का स्वामी कहा गया है। इस दिन विधिवत व्रत करने से श्रीगणेश तत्काल प्रसन्न हो जाते हैं। इस दिन को कलंक-चौथ के नाम से भी जाना जाता है।
भगवान श्री कृष्ण को स्मयंतक मणि चोरी करने का कलंक लगा था, यह मणि प्रसेन ने चुराई थी। एक सिंह ने प्रसेन को मार दिया था फिर जामवंत ने उस सिंह का वध कर वह मणि हासिल किया। इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने जामवंत को युद्ध में पराजित कर इस मणि को हासिल कर कलंकमुक्त हुए थे।
मिथिलांचल में यह लोकपर्व 16 वीं शताब्दी से मनाया जा रहा है। मिथिला नरेश महाराजा हेमांगद ठाकुर के कलंक मुक्त होने के बाद महारानी हेमलता ने कलंकित चांद को पूजने की परंपरा शुरु की, जो बाद में मिथिला का लोकपर्व बन गया। इस पर्व को हर जाति, हर वर्ग के लोग हर्षोल्लाष पूर्वक मानते हैं। कहते हैं कि इसदिन चन्द्रमा का दर्शन खाली हाथ नहीं करना चाहिए। यथासंभव हाथ में फल अथवा मिठाई लेकर चन्द्र दर्शन करने से मनुष्य का जीवन दोषमुक्त व कलंकमुक्त होता है।

मारूति नंदन मिश्र
खगड़िया

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