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Bihar। बांधों ने बढ़ाई बाढ़ की विभिषिका

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आमतौर पर नदियाँ बरसात के समय उफान पर आती हैं। इस चातुर्मास में हम सब लोग बाढ़ के साथ जीने का तरीका बनाए हुए थे। उस हिसाब से जीते थे। इससे बाढ़ तो आती थीं, लेकिन वह विनाशकारी नहीं होती थीं। यह बात गाँधी विचार विभाग, तिलकामाँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर के अध्यक्ष डाॅ. विजय कुमार ने कही। वे बीएनएमयू संवाद व्याख्यानमाला के अंतर्गत बाढ़ से मुक्ति : कब और कैसे विषय पर व्याख्यान दे रहे थे।उन्होंने बताया कि विकास की अंधदौड़ में हमने नदियों पर बांध बांध दिया और उसके प्राकृतिक प्रवाह से छेड़छाड़ किया। इसके कारण बाढ़ की समस्या ने विकराल रूप धारण किया। उन्होंने कहा कि बाढ़ आपदा नहीं है। यह वरदान है। बाढ़ प्राकृतिक क्रिया है। हमें इसके साथ जीने की कला का पुनः स्मरण करना होगा।

उन्होंने कहा कि हमारी सरकारों ने लोगों को विकास के सपने दिखाए। बैराज बनाए। कहा कि इससे बिजली मिलेगी और खेतों को सही से पानी मिलेगी।लेकिन यह सब कुछ भी नहीं हुआ। उल्टे बाढ़ की विभाषिका बढ़ी। उन्होंने कहा कि बाढ़ की समस्या के समाधान के लिए हमें फरक्का बैराज और अन्य बांधों का कुछ इलाज ढूंढना होगा। जो लोग बाढ़ से आजादी की इच्छा रखते हैं, उनको इस पर विचार करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि हमारे सरकारी तंत्र में बाढ़ नियंत्रण के दो तरीके सुझाए गए हैं। उनके पास एक तरीका है बांध का और दूसरा तरीका है नदी जोड़ो अभियान का। बांध विनाशकारी हैं और नदियों को अस्वभाविक रूप में जोड़ना उचित नहीं है। यह प्राकृतिक रूप से सुनिश्चित किया जाना चाहिए, जैसा पहले से था। उन्होंने कहा कि नदी का स्वभाव है बहना। नदी को जहां रास्ता मिल पाता है, नदी बेचैन होकर भागती है। नदियाँ रास्ता तलाश रही हैं। उन्होंने कहा कि हमें आपस में संवाद, सहयोग और समन्वय की जरूरत है। जनता के ज्ञान को आगे लाने की जरूरत है। समाज के स्तर पर कोई रास्ता निकालना चाहिए। रिपोर्ट- गौरब कुमार सिंह,                          गाँधी विचार विभाग, तिलकामाँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार

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