हवाओं का रुख बदला है,
सूखे पत्तों को हवाओं से क्या डर
ले जायें न जाने किस डगर
टूटा जो दरख़्त से कभी
रंग बदला, ढंग भी बदला
तक़दीर का रूख हर पल बदला !
डरना कैसा इस टूटन से
जीत लेंगे हर उलझन से,
ज़माना याद करता सफ़रनामा वही
जहाँ पत्ते ने हवाओं का रूख बदला कहीं !!
अंजलि आहूजा
आहूजा भवन, कमलेश्वर रोड
श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड
पिन-246174
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