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Poem। कविता/ सिलसिला/ प्रोफेसर डाॅ. इंदु पाण्डेय खण्डूड़ी

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सिलसिला

जारी है,                                                  सजा देने का सिलसिला,
प्रकृति प्रदत्त विवशताएँ
सजा के बीज बोती हैं।
दूसरी कड़ी वो जोड़ देता है,
जो विवशताएँ ना समझ,
उन्हें अपनी सोच के रंग से
यथार्थ से बहुत भिन्न रूप में,
रचता है, सहेजता है,
और खफा हो जाता है।
तीसरी सजा की कड़ी
हम खुद ही जोड़ देते है,
अपनी अपेक्षाओं में कैद होकर।
सजा का सिलसिला,
जारी रहता है,
हम बेगुनाह होकर,
गुनहगारों की श्रेणी में रख दिए जाते है,
फिर भी मुस्कुराते है।

-प्रोफेसर डाॅ. इंदु पाण्डेय खण्डूड़ी, अध्यक्षा, दर्शनशास्त्र विभाग, हे. न. ब.  गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय,श्रीनगर-गढ़वाल, उत्तराखंड

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