*अतीत को जानना जरूरी है। अतीत को जाने बगैर भविष्य की नींव नहीं रखी जा सकती है*
ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय मधेपुरा के संस्थापक महामना कीर्ति नारायण मंडल की 30वीं पुण्यतिथि पर शनिवार को कोसी की सांस्कृतिक विरासत विषयक राष्ट्रीय सेमिनार (कीर्ति कुम्भ) का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर उद्घाटनकर्ता के रूप में उपस्थित सुप्रसिद्ध समाजवादी एवं साहित्यकार प्रो. भूपेंद्र नारायण यादव ‘मधेपुरी’ ने कहा कि अतीत को जानना जरूरी है। अतीत को जाने बगैर भविष्य का नींव नहीं रखा जा सकता है।
उन्होंने कहा कि कोसी में शिक्षा के प्रचार-प्रसार में कीर्ति नारायण मंडल का योगदान सर्वोपरि है। उनकी त्याग-तपस्या एवं कर्मनिष्ठा से हमें प्रेरणा मिलती है। उनकी यश, कीर्ति एवं ख्याति आज भी कायम है और हमेशा कायम रहेगी।
उन्होंने कहा कहा कि कीर्ति बाबू ने समाज में शिक्षा की रौशनी फैलाने के लिए महात्मा बुद्ध की तरह अपना गृहत्याग कर दिया। वे ज्ञान की खोज में वे बनारस एवं प्रयागराज आदि धर्म स्थल भी गए। अंततः उन्हें यह ज्ञान हुआ कि दुखी-पीड़ित लोगों की सेवा की। वे
श्यामा प्रसाद मुखर्जी की तरह चुनकर विद्वानों को अपने संस्थान में लाते थे।
कर्ण की तरह दानी थे कीर्ति बाबू : मुख्य वक्ता मानविकी संकाय के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विनय कुमार चौधरी ने कहा कि कीर्ति बाबू कर्ण की तरह महादानी थे। उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति संपत्ति का कण-कण समाज को दान कर दिया और अपने लिए कुछ भी बचाकर नहीं रखा। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन शिक्षा-जागरण के लिए समर्पित कर दिया।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रधानाचार्य प्रो. कैलाश प्रसाद यादव ने कहा कि कीर्ति नारायण मंडल ने अपने पिता एवं माता दोनों के नाम पर महाविद्यालय की स्थापना की। पिता के नाम पर ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय और अपनी माता के नाम पर पार्वती विज्ञान महाविद्यालय की स्थापना की। आगे यही दोनों महाविद्यालय मधेपुरा में विश्वविद्यालय के निर्माण का आधार बना। उन्होंने कहा कि यह कीर्ति-कुंभ कीर्ति बाबू के साथ साथ कोसी की संपूर्ण सांस्कृतिक विरासत को जानने-समझने का एक प्रयास है।
पूर्व प्रधानाचार्य प्रो. के. पी. यादव ने कहा कि कीर्ति बाबू के जीवन में तप की आग एवं तपस्या की ज्वाला थी। उनके विचारों एवं कार्यों को आगे बढ़ाने की जरूरत है।
छात्र कल्याण पदाधिकारी प्रो. अशोक कुमार ने कहा कि किसी एक शिक्षण संस्थान की परिकल्पना अपने आप में दुरूह कार्य है। लेकिन कीर्ति बाबू ने दर्जन भर संस्थानों की स्थापना किया जो आज इस क्षेत्र की प्रतिभाओं को उड़ान दे रहा है।
आईक्यूएसी निदेशक प्रो. नरेश कुमार ने कहा कि बाबा के नाम से चर्चित कीर्ति नारायण मंडल आखिरी दिनों में उनके वहां ही रहा करते थे उनके सानिध्य में गुजरे पल अनमोल हैं।
इस अवसर पर अर्थपाल डॉ. रत्नदीप द्वारा स्वागत-भाषण दिया गया। उन्होंने कहा कि कोसी की अपनी सांस्कृतिक, राजनीतिक, सामाजिक विरासत का गौरवशाली इतिहास है। आयोजन को बनाया गया है
संयोजक डॉ. सुधांशु शेखर ने विषय प्रवेश कराया। उन्होंने कहा कि कोसी की संस्कृति में सभी मनुष्यों तथा मनुष्येतर प्राणियों के प्रति कृतज्ञता का भाव है। कीर्ति-कुम्भ भी वास्तव में ज्ञान-यज्ञ के साथ-साथ अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का अनुष्ठान है।
इस अवसर पर परीक्षा नियंत्रक डॉ. शंकर कुमार मिश्र एवं पूर्व अर्थपाल डॉ. मिथिलेश कुमार अरिमर्दन ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम के प्रारंभ में में सर्वप्रथम विज्ञान परिसर में कीर्ति नारायण मंडल की प्रतिमा एवं कॉलेज परिसर में ठाकुर प्रसाद की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। तदुपरांत मुख्य कार्यक्रम स्थल सभा कीर्ति बाबू की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित की गई।
मंचस्थ अतिथियों को अंगवस्त्र, पुष्पगुच्छ एवं स्मृति चिह्न भेंटकर के साथ सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. हर्षवर्धन सिंह राठौड़ ने किया।
उन्होंने बताया कि द्वितीय सत्र में आफलाइन पेपर प्रजेंटेशन हुआ। इसकी अध्यक्षता प्रो. सिद्धेश्वर काश्यप ने की। इसमें विभिन्न प्रांतों, विश्वविद्यालयों, कॉलेजों से आए एक दर्जन शिक्षकों एवं शोधार्थियों ने आलेख और शोध सार का वाचन किया।
*ऑनलाइन सत्र में प्रस्तुत किए गए 6 शोध-पत्र*
तीसरे सत्र में ऑनलाइन मोड में में भी विभिन्न विषयों पर वक्ताओं ने अपनी बातें रखी। इसकी अध्यक्षता बीएनएमयू, मधेपुरा में प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. ललन प्रसाद अद्री ने किया। उन्होंने कहा कि कीर्ति बाबू ने अपने कर्मों के बल पर कोसी-सीमांचल में शैक्षणिक क्रांति ला दी।
इस सत्र में कुल 6 शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए। बीएनएमयू, मधेपुरा के शोधार्थी सुनंदा कुमारी ने कोशी की सांस्कृतिक एवं राजनीतिक परिदृश्य विषय पर अपने विचार व्यक्त किए।
मगध विश्वविद्यालय, बोधगया के शिव नारायण सिंह के शोध-पत्र का विषय था ब्रिटिश औधोगिक नीतियों का बिहार के घरेलू उद्योगों पर प्रभाव। रमेश झा महिला महाविद्यालय, सहरसा में अतिथि व्याख्याता डॉ. रूबी कुमारी ने भारत के प्राचीन इतिहास में कोशी का स्थान को रेखांकित किया।
ऑनलाइन सत्र का संचालन राजनीति विज्ञान विभाग, महिला महाविद्यालय, खगड़िया में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रियंका सिंह ने किया। तकनीकी पक्ष शोधार्थी डॉ. सौरभ कुमार चौहान एवं विद्यार्थी विवेक शर्मा ने संभाला। इस अवसर पर गणित विभागाध्यक्ष ले. डॉ. गुड्डू कुमार, मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार, बीएड विभागाध्यक्ष डॉ. जावेद अहमद, बीसीए विभागाध्यक्ष के. के. भारती, असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शंभू पासवान (मुंगेर), सीनेटर डॉ. रंजन कुमार, शोधार्थी डॉ. सारंग तनय, डॉ. मणीष कुमार, डॉ. सोनम, डॉ. अचला विवेकानंद, रणवीर कुमार, राजदीप कुमार, अशोक मुखिया आदि उपस्थित थे।
चतुर्थ सत्र (समापन सत्र) में प्रमाण-पत्र वितरित किया गया। समापन के पूर्व कार्यक्रम संयोजक डॉ. सुधांशु शेखर ने आयोजन में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने वाले सभी लोगों के प्रति आभार प्रकट किया। राष्ट्रगीत वंदे मातरम् एवं राष्ट्रगान जन-गण-मन के सामूहिक गायन के साथ कार्यक्रम संपन्न होने की घोषणा की गई।













