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अग्रज डॉ. रत्नदीप को बहुत-बहुत बधाई …

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अग्रज डॉ. रत्नदीप को बहुत-बहुत बधाई
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मेरे पुराने महाविद्यालय (ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा) के अर्थपाल, अध्यक्ष (शिक्षक संघ) एवं विभागाध्यक्ष (रसायनशास्त्र) अग्रज डॉ. रत्नदीप जी को राजकीय डिग्री महाविद्यालय, घैलाढ़-मधेपुरा का प्रथम प्रधानाचार्य बनने पर बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं। मुझे आपके साथ असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में लगभग साढ़े आठ वर्ष तथा शिक्षक संघ के सचिव के रूप में एक वर्ष कार्य करने का सुअवसर मिला। इस दौरान अपने मुझे जो स्नेह दिया, इसके लिए मैं सदैव आपका आभारी रहूंगा।

यहाँ यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि डॉ. रत्नदीप हम सबों के अभिभावक बीएनएमयू, मधेपुरा के संस्थापक कुलपति प्रो. रमेन्द्र कुमार यादव ‘रवि’ (जो लोकसभा एवं राज्यसभा के सांसद भी रहे) के ज्येष्ठ सुपुत्र हैं। मुझे यह स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं की आपसे मेरे विशेष लगाव की एक प्रमुख वजह यह भी है। इसलिए आज मैं सर्वप्रथम रवि बाबू का शुभ-स्मरण करना चाहता ह हूँ।

इस क्रम में तत्माकालीन माननीय कुलपति गुरुवर प्रो. अवध किशोर राय सर को भी याद करना भी लाजमी है। इन्होंने कृपापूर्वक असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में मेरा पदस्थापना विश्वविद्यालय के सर्वश्रेष्ठ महाविद्यालय (ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा) में किया, जो प्रो. रवि की कर्मस्थली तो रहा ही है, बीएनएमयू की जन्मस्थली भी है। इस तरह अवध बाबू ने स्वाभाविक रूप से मेरे मन-मस्तिष्क को मुझे प्रो. रवि जैसे महापुरुष और ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा की गौरवशाली विरासत से सीधे जोड़ दिया। यहीं हमारी डॉ. रत्नदीप भैया से पहली मुलाकात भी हुई।

आगे मुझे रवि बाबू से भौतिक रूप में परिचित कराने में अनुजद्वय श्री राहुल यादव जी एवं श्री हर्षवर्धन सिंह राठौड़ जी तथा अग्रज द्वय डॉ. जवाहर पासवान जी एवं श्री शंभू नारायण यादव जी की बड़ी भूमिका रही। यह बताना भी यथेष्ट है कि जनसंपर्क पदाधिकारी के रूप में मेरा ज्यादा समय तत्कालीन कुलपति प्रो. अवध बाबू के आसपास ही बीतता था और उन्होंने मुझे अपने कार्यालय कक्ष में ही मेरे लिए भी एक छोटा-सा कार्यालय दे दिया था। ऐसे में स्वाभाविक रूप से मेरा ज्यादा समय श्री शंभू नारायण यादव जी, जो कुलपति के निजी सहायक सह सचिव थे के साथ बीतता था। ऐसे में मुझे उनके माध्यम से विश्वविद्यालय की संस्थापना की कहानी और सभी कुलपतियों के योगदान को जानने-समझने का अवसर मिला।

खास बात यह है कि मुझे शंभू बाबू के मुखारविंद से अक्सर प्रो. रवि के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के बारे में अत्यधिक जानकारियां मिलीं। इससे मेरे अंतर्मन में रवि बाबू के प्रति श्रद्धा एवं भक्ति बढ़ती गई। मुझे उनका भाषण सुनना हमेशा प्रीतिकर लगता था और उनका चरण-स्पर्श करते हुए मेरा तन-मन रोमांचित हो जाता था। आज भी उनका स्मरण मुझे सकारात्मक उर्जा से अभिभूत कर देता है।

यहाँ यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि मैंने ‘प्रो. रवि की पाठशाला’ श्रंखला के अंतर्गत रवि बाबू से कई घंटों के संवाद की रिकार्डिंग की और उनके अथाह ज्ञान-गंगा में गोते लगाने का पुण्य प्राप्त कर सका। यह कहना आवश्यक है कि इस ज्ञान-यज्ञ में यजमान की भूमिका रत्नदीप भैया की ही रही।

यह बताना भी अप्रासंगिक नहीं है कि प्रो. रवि के निधन के बाद हम लोगों ने उनकी स्मृतियों को अच्क्षुण्ण बनाए रखने और उनके विचारों एवं कार्यों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से प्रो. रवि विचार मंच (अध्यक्ष श्री शंभू नारायण यादव एवं सचिव डॉ. सुधांशु शेखर) का गठन किया है। इस मंच के तत्वावधान में विश्वविद्यालय परिसर में प्रो. रवि की प्रतिमा निर्माणाधीन है, जिसके स्थल का भूमिपूजन गत वर्ष पूरे विधि-विधान के साथ स्वयं माननीय कुलपति प्रो. बी. एस. झा सर के कर-कमलों से संपन्न हुआ है। इस कार्यक्रम के मुख्य व्यवस्थापक डॉ. रत्नदीप भैया ही थे।

बहरहाल डॉ. रत्नदीप भैया के बारे में कहने को बातें बहुत अधिक हैं- प्रायः सभी मीठी- मीठी बातें, लेकिन एकाध थोड़ी खट्टी भी। लेकिन मैं अभी उन सबों की चर्चा नहीं करते हुए केवल यह बताना चाहता हूँ कि मुझे इनके साथ शिक्षक संघ के सचिव के रूप में कार्य करते हुए बहुत ही अच्छा लगा। आपके कुशल मार्गदर्शन में हमने संघ को काफी गतिशील बनाया और सीमित संसाधनों के बावजूद कई अच्छे-अच्छे कार्यक्रम भी आयोजित किए।

अंत में इस चर्चा को यहीं विराम देते हुए मैं पुनः अग्रज डॉ. रत्नदीप को प्रधानाचार्य का नया दायित्व मिलने पर बधाई देता हूँ। मुझे आशा ही नहीं, वरन् पूर्ण विश्वास है कि नव-स्थापित महाविद्यालय को आपकी अद्भुत संगठन क्षमता एवं लंबे शैक्षणिक- सामाजिक अनुभव का भरपूर लाभ मिलेगा और यह महाविद्यालय कम-से-कम सभी नव-स्थापित महाविद्यालयों में अवश्य ही प्रथम स्थान पर रहेगा। पुनः-पुन: बहुत-बहुत बधाई…।

-सुधांशु शेखर, सीनेट सदस्य, बीएनएमयू, मधेपुरा।

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