
Poem। कविता/अकेला आदमी/ इन्दु पाण्डेय खण्डूड़ी
अकेला आदमी अक्सर विसंगतियों से, लड़ता हुआ इंसान खुद से, थककर मायूस हो जाता है। परत-दर-परत व्याप्त भ्रष्टाचार, दर्द से तड़पता हुआ त्रस्त, अपनी क्षमताओं

अकेला आदमी अक्सर विसंगतियों से, लड़ता हुआ इंसान खुद से, थककर मायूस हो जाता है। परत-दर-परत व्याप्त भ्रष्टाचार, दर्द से तड़पता हुआ त्रस्त, अपनी क्षमताओं

आज देश का युवा, सड़कों पर भटक रहा है। हाथों में उपाधियों का पुलिंदा झोले में कंधे पर ढो रहा है। जिंदगी के सवालों से
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