
Hindi। समाज एवं साहित्य में अंतर्संबंध बनाना होगा
साहित्य को समाज सापेक्ष होना जरूरी है। केवल कल्पना की उड़ान वाला साहित्य आनंददायक हो सकता है, लेकिन वह समय का दस्तावेज नहीं बनता है।

साहित्य को समाज सापेक्ष होना जरूरी है। केवल कल्पना की उड़ान वाला साहित्य आनंददायक हो सकता है, लेकिन वह समय का दस्तावेज नहीं बनता है।

दूध के गाछ अलसुबह कुछ प्रतीक शब्द बन दिल के दरवाजे पर हौले-हौले देने लगे दस्तक मैंने झट-से खोल दिए पल्ले वे दाखिल हुए मेरे

कविता/ गुम गया लोकतंंत्र ———————– मुल्क की सियासत मानो एक गुम रास्ता जिस पर चल रहे सियासतदां आड़े-तीरछे, उड़ते-गोते खाते जैसे वे एक शिकारी हों

इतिहास के पन्नों में नयागाँव, परबत्ता ==================== बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री बिहार केसरी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह जी का इस क्षेत्र से गहरा सम्बन्ध रहा है।

महामारी ——— प्रेम प्रभाकर ‘दुहाई! कोरोना माय की।’ ‘रच्छा करो, कोरोना माय! भूल-चूक, लेनी-देनी, …तुरुटी को छिमा करो! आपका जो भी कौल-करार है, सब पूरा

अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में कुलपति ने की भागीदारी —– कोविड-19 का देश-दुनिया की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा है। शहर और गांव दोनों इससे प्रभावित हैं।

Dr. Vishwa Deepak Tripathi 3 सितंबर 2020 को ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विभिन्न आयाम विषयक वेबीनार में आमंत्रित वक्ता के
WhatsApp us