वाराणसी, 11.08.2026- काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत अध्ययन केन्द्र एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित पन्द्रह दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला “भारत अध्ययन की परम्परा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएँ” के दूसरे दिन 11 अगस्त, 2026 (मंगलवार) को भारतीय वैज्ञानिक परम्परा, वैज्ञानिक स्वाभिमान तथा भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि से जुड़े विभिन्न पक्षों पर विमर्श हुआ। कार्यशाला का आयोजन 10 से 31 अगस्त, 2026 तक हाइब्रिड माध्यम से किया जा रहा है।
कार्यक्रम में “भारत का वैज्ञानिक परिदृश्य और जगदीश चंद्र बोस” तथा “भारत का सांस्कृतिक संदर्भ और वासुदेवशरण अग्रवाल” विषयों पर विद्वानों ने अपने विचार रखे।
“भारत का वैज्ञानिक परिदृश्य और जगदीश चंद्र बोस” विषय पर व्याख्यान देते हुए आईआईटी (बीएचयू), वाराणसी के विद्युत अभियांत्रिकी विभाग के प्रो. राकेश कुमार मिश्रा ने कहा कि भारत में विज्ञान की परम्परा को केवल आधुनिक काल से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। भारत में गणित, शून्य, दशमलव पद्धति, बीजगणित, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद, धातुकर्म, स्थापत्य, जल प्रबंधन और कृषि सहित अनेक क्षेत्रों में ज्ञान और प्रयोग की समृद्ध परम्परा रही है। उन्होंने कहा कि आधुनिक विज्ञान की अपनी विशिष्ट संस्थागत संरचना है, जिसमें प्रयोग, मापन, पुनरुत्पादक परिणाम, प्रयोगशाला, वैज्ञानिक प्रकाशन, सहकर्मी समीक्षा और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक संवाद जैसी प्रक्रियाएँ शामिल हैं। प्रो. मिश्रा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा और आधुनिक संस्थागत विज्ञान के बीच संबंध को समझते हुए भारत के वैज्ञानिक इतिहास का अध्ययन किया जाना चाहिए। उन्होंने आचार्य जगदीश चंद्र बोस के जीवन और वैज्ञानिक योगदान को भारतीय वैज्ञानिक स्वाभिमान का महत्त्वपूर्ण उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि बोस ने विज्ञान को केवल सैद्धांतिक ज्ञान के रूप में नहीं देखा, बल्कि प्रयोग और उपकरण निर्माण के माध्यम से वैज्ञानिक प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास किया।
उन्होंने आचार्य जगदीश चंद्र बोस के जीवन के विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके व्यक्तित्व के निर्माण में परिवार, शिक्षा और प्रकृति के साथ उनके प्रारंभिक संपर्क की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने बंगाली माध्यम से उनकी प्रारंभिक शिक्षा तथा विभिन्न सामाजिक वर्गों के बच्चों के साथ उनके संपर्क का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके अनुभवों ने उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण को व्यापक बनाया। प्रो. मिश्रा ने बोस के वैज्ञानिक अनुसंधान की पद्धति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण “अवलोकन से मापन” की ओर बढ़ता है। केवल यह कहना कि कोई पौधा बढ़ रहा है, पर्याप्त नहीं है; वैज्ञानिक दृष्टि यह पूछती है कि उसकी वृद्धि की दर कितनी है और किसी बाहरी उद्दीपन के बदलने पर उसकी प्रतिक्रिया में कितना परिवर्तन होता है। उन्होंने कहा कि बोस ने इसी प्रकार के प्रश्नों को प्रयोग और उपकरणों के माध्यम से मापने का प्रयास किया।
उन्होंने क्रेस्कोग्राफ, ऑप्टिकल पल्स रिकॉर्डर, वेवगाइड, हॉर्न संरचना, पोलराइजर और डिटेक्टर सहित उनके द्वारा विकसित एवं प्रयोग किए गए वैज्ञानिक उपकरणों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि बोस ने पौधों की संवेदनशीलता और विभिन्न उद्दीपनों के प्रति उनकी प्रतिक्रियाओं को मापने के लिए प्रयोग किए। मिमोसा जैसे पौधों पर किए गए प्रयोगों के माध्यम से उन्होंने पौधों की प्रतिक्रियाओं को वैज्ञानिक रूप से दर्ज करने का प्रयास किया।
प्रो. मिश्रा ने कहा कि आचार्य जगदीश चंद्र बोस की विरासत को केवल उनके वैज्ञानिक आविष्कारों तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। उनकी वैज्ञानिक जिज्ञासा, प्रयोगधर्मिता, उपकरण निर्माण, अंतर्विषयी दृष्टिकोण, वैज्ञानिक स्वाभिमान और संस्थान निर्माण उनकी विरासत के महत्त्वपूर्ण आयाम हैं। उन्होंने कहा कि बोस का वैज्ञानिक दृष्टिकोण एक ऐसी प्रक्रिया को सामने रखता है जिसमें प्रश्न, मापन, प्रयोग, सत्यापन, वैज्ञानिक संवाद और संस्थान निर्माण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
उन्होंने कहा कि बोस का वैज्ञानिक जीवन औपनिवेशिक भारत में वैज्ञानिक स्वाभिमान का भी उदाहरण है। उस दौर में यह धारणा प्रचलित थी कि मौलिक वैज्ञानिक चिंतन की क्षमता पश्चिमी समाजों तक सीमित है, लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों ने अपने कार्य से इस धारणा को चुनौती दी। उन्होंने 1896 में रॉयल इंस्टीट्यूशन में बोस के वैज्ञानिक प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके कार्य ने भारतीय वैज्ञानिक प्रतिभा के प्रति अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण को प्रभावित किया। प्रो. मिश्रा ने बोस द्वारा अपने वैज्ञानिक उपकरणों और अनुसंधान को केवल व्यक्तिगत आर्थिक लाभ के दृष्टिकोण से न देखने की प्रवृत्ति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि विज्ञान उनके लिए ज्ञान की खोज और मानवता के हित से जुड़ा हुआ था। इसी वैज्ञानिक दृष्टि को आगे बढ़ाते हुए बोस इंस्टीट्यूट जैसे संस्थान भारतीय वैज्ञानिक परम्परा के विकास में महत्त्वपूर्ण बने।
प्रो. मिश्रा ने कहा कि आज के भारत के सामने यह प्रश्न भी है कि क्या हम वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता की दिशा में पर्याप्त रूप से आगे बढ़ रहे हैं। क्या हम सीमांत स्तर के नए वैज्ञानिक प्रश्न उठा रहे हैं, अपने वैज्ञानिक उपकरण और तकनीक विकसित कर रहे हैं तथा वैश्विक ज्ञान में मौलिक योगदान दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि आचार्य जगदीश चंद्र बोस की विरासत इन प्रश्नों पर आज भी विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
“भारत का सांस्कृतिक संदर्भ और वासुदेवशरण अग्रवाल” विषय पर डॉ. रमाशंकर सिंह ने अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारत को समझने के लिए औपनिवेशिक दृष्टिकोण से बाहर निकलकर भारतीय स्रोतों, परम्पराओं, साहित्य, लोकसंस्कृति और ज्ञान परम्परा के आधार पर स्वतंत्र दृष्टि विकसित करने की आवश्यकता है।
डॉ. सिंह ने औपनिवेशिक काल में भारत के अध्ययन और ज्ञान-निर्माण की प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहा कि औपनिवेशिक सत्ता केवल राजनीतिक नियंत्रण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि ज्ञान और विचार के नए रूपों का निर्माण भी करती है। उन्होंने कहा कि सबसे खतरनाक गुलामी वह होती है, जो दिखाई नहीं देती। मानसिक और बौद्धिक स्तर पर स्थापित निर्भरता व्यक्ति को अपनी ही परम्पराओं को दूसरे की दृष्टि से देखने के लिए बाध्य कर सकती है।
डॉ. सिंह ने भाषा के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा कि किसी भाषा की शब्द-संपदा और शब्दकोश का लगातार कमजोर होना उस भाषा की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में गिरावट का संकेत हो सकता है। उन्होंने कहा कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की स्मृति, ज्ञान और सांस्कृतिक अनुभव की वाहक होती है। इसलिए भाषा के विकास और उसकी शब्द-संपदा की निरंतरता को बनाए रखना आवश्यक है।
वासुदेवशरण अग्रवाल ने भारतीय कला की मौलिकता को बाहरी प्रभावों के माध्यम से समझने की प्रवृत्ति के विपरीत भारतीय साहित्य, पुराणों, लोकपरम्पराओं और सांस्कृतिक स्रोतों के आधार पर भारतीय कला और संस्कृति की स्वतंत्र विकास-परम्परा को समझने का प्रयास किया।
डॉ. सिंह ने कहा कि वासुदेवशरण अग्रवाल भारतीय संस्कृति को उसकी आंतरिक निरंतरता और विकासक्रम के साथ देखने के पक्षधर थे। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति को केवल बाहर से आए प्रभावों की परिणति मानना उचित नहीं है। भारतीय साहित्य, लोकपरम्परा और सांस्कृतिक जीवन में इसकी अपनी दीर्घ और निरंतर विकासशील परम्परा दिखाई देती है।
उन्होंने भारतीय जीवन में धर्म की भूमिका पर कहा कि भारत में धर्म केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की संरचना को धर्म और उसकी व्यापक जीवन-दृष्टि से अलग करके समझना कठिन है। उन्होंने कहा कि वासुदेवशरण अग्रवाल भारतीय साहित्य के क्रमिक विकास को समझने पर विशेष बल देते हैं और भारतीय संस्कृति को समझने के लिए साहित्य, लोकपरम्परा तथा शास्त्रीय स्रोतों को एक साथ पढ़ने की आवश्यकता है। डॉ. सिंह ने कहा कि किसी देश का निर्माण केवल राजनेता नहीं, बल्कि कवि और शिल्पी भी करते हैं। साहित्यकार और कलाकार समाज की चेतना और संवेदना को आकार देने का कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि शोध करने वाले व्यक्ति को बहुश्रुत होना चाहिए। शोधकर्ता का अध्ययन केवल अपने विषय तक सीमित न होकर साहित्य, इतिहास, संस्कृति, लोकपरम्परा और विभिन्न ज्ञान-विधाओं तक विस्तृत होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वासुदेवशरण अग्रवाल का महत्त्व इस बात में भी है कि उन्होंने भारत को देखने के लिए एक संवेदनशील और आत्मीय दृष्टि विकसित करने का प्रयास किया। भारत को समझने के लिए भारतीय समाज और संस्कृति को “नरम निगाह” से देखने तथा अपनी स्वतंत्र दृष्टि निर्मित करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान और संस्कृति का अध्ययन करते समय औपनिवेशिक पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर अपने स्रोतों के आधार पर निष्कर्ष तक पहुँचना चाहिए।
कार्यशाला के दूसरे दिन के दोनों सत्रों में भारतीय वैज्ञानिक परम्परा, वैज्ञानिक स्वाभिमान, औपनिवेशिक ज्ञान-व्यवस्था, भारतीय सांस्कृतिक निरंतरता, भाषा, साहित्य, लोकपरम्परा और स्वतंत्र भारतीय दृष्टि जैसे विभिन्न विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ।
कार्यक्रम के अंत में कार्यक्रम संयोजक डॉ. अमित कुमार पाण्डेय ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय सहित विभिन्न संस्थानों के शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं भारत अध्ययन में रुचि रखने वाले प्रतिभागी भौतिक एवं हाइब्रिड माध्यम से उपस्थित रहे।














