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बनारस को समझने की कोशिश मत करो…

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बनारस को समझने की कोशिश मत करो…

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डॉ. क्रिस्टोफर विल्सन जब बनारस रेलवे पर उतरे, तो उनके पास तीन सूटकेस, दो लैपटॉप, एक हाई-टेक वॉयस रिकॉर्डर और अमेरिकी सरकार से मिला पाँच लाख डॉलर का रिसर्च ग्रांट था। क्रिस्टोफर का मानना था कि दुनिया की हर समस्या का समाधान ‘डेटा’ और ‘स्टैटिस्टिक्स’ (आँकड़ों) से हो सकता है।

वे रेलवे स्टेशन से टैक्सी में बैठे। जैसे ही टैक्सी गोदौलिया चौराहे के पास पहुँची, क्रिस्टोफर का ‘हार्वर्ड लॉजिक’ धड़ाम हो गया। सामने का नजारा ऐसा था जैसे पूरी दुनिया की आबादी, सारे सांड, सारी मोटरसाइकिलें, और तीन-चार बारातें एक साथ एक ही संकरी गली में घुसने की जिद कर रही हों।

ट्रैफिक पिछले ४५ मिनट से एक इंच भी नहीं हिला था। क्रिस्टोफर ने परेशान होकर टैक्सी ड्राइवर—’कल्लू भाई’ से पूछा, “मिस्टर ड्राइवर, यहाँ ट्रैफिक मैनेजमेंट का कोई सिस्टम क्यों नहीं है? व्हाई इज एवरीवन हॉर्निंग? (सब हॉर्न क्यों बजा रहे हैं?)”

कल्लू भाई ने आराम से अपनी सीट के नीचे से खैनी का डिब्बा निकाला, हथेली पर चूना रगड़ा, एक ‘थप्पड़’ खैनी को मारा और मुँह में दबाते हुए बोले, “अरे साहेब, काहे हाइपर हो रहे हैं? ई ट्रैफिक नहीं है, ई ‘मिलन समारोह’ है। यहाँ हॉर्न बजाने का मतलब ई नहीं है कि सामने वाले को हटना है। हॉर्न बजाने का मतलब होता है—’भैया, हम भी यहीं हैं, तुम भी यहीं हो, जरा सट के चलो, अच्छा लग रहा है!’ आराम से बैठिए, अभी आधा घंटा और लगेगा, तब तक गाड़ी का एसी बंद कर दें? पेट्रोल फालतू जल रहा है।”

क्रिस्टोफर ने अपनी डायरी खोली और काँपते हाथों से पहला नोट लिखा: “In Banaras, traffic is not a logistics problem; it is a spiritual get-together. Time has no value, but petrol has.”

क्रिस्टोफर साहब को बनारस रिसर्च के लिए एक लोकल गाइड की जरूरत थी। होटल के मैनेजर ने उन्हें मिलवाया—कतवारू गुरु से। कतवारू गुरु वो शख्स थे जो अस्सी घाट पर पिछले १५ साल से बिना किसी नौकरी के, सिर्फ एक बनारसी गमछा कंधे पर डाल के ‘इंटरनेशनल अफेयर्स’ पर चर्चा करते थे। उनका मुख्य काम था—विदेशी रिसर्चरों का ‘ज्ञान चक्षु’ खोलना।

क्रिस्टोफर ने कतवारू गुरु को अपने वीआईपी होटल के कमरे में बुलाया। क्रिस्टोफर ने अपना आईपैड ऑन किया और बोले, “मिस्टर कतवारू, मुझे बनारस के ‘टाइम मैनेजमेंट’ पर डेटा चाहिए। यहाँ के लोग दुकान कब खोलते हैं और कब बंद करते हैं, इसका कोई फिक्स टाइम टेबल है?”

कतवारू गुरु हँसे। ऐसी हँसी जिसमें हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की पूरी साक्षरता दर पर तरस खाया गया हो। उन्होंने चबाए हुए पान का रस थूकदान में डाला और बोले, “देखो डॉक्टर साहेब, आपके अमेरिका में घड़ी लोगों को चलाती है। हमारे बनारस में लोग घड़ी को चलाते हैं। यहाँ दुकान खुलने का समय ई नहीं है कि सुबह 9 बज गए। यहाँ दुकान तब खुलती है जब दुकानदार की नींद खुलती है, और दुकान की मालकिन (पत्नी) चाय की पत्ती खत्म होने की शिकायत करती है। और बंद होने का समय? जब पप्पू भाई का मूड हो जाए कि ‘अब बहुत पैसा कमा लिए, अब जरा घाट पर जाके हवा खाया जाए’, तो शटर धड़ाम! यहाँ बिजनेस ‘प्रॉफिट’ पर नहीं, ‘मूड’ पर चलता है।”

क्रिस्टोफर ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, “बट दिस इज इकोनॉमिक सुसाइड! (यह तो आर्थिक आत्महत्या है!)”

कतवारू गुरु ने क्रिस्टोफर के सूट वाले कंधे पर अपना हाथ रखा और बोले, “यही तो आप नहीं समझ पा रहे हैं गुरु। जो रोज कमा के रोज राजा है, उसको सुसाइड का डर क्या? यहाँ हर आदमी ‘किंग’ है, बस उसका कोई किंगडम नहीं है।”

क्रिस्टोफर को लगा कि अगर लोगों का मूड समझना है, तो उनके खान-पान पर रिसर्च करनी होगी। कतवारू गुरु उन्हें सुबह-सुबह ‘कचौड़ी गली’ ले गए। गली इतनी संकरी कि अगर दो मोटे आदमी आमने-सामने से आ जाएं, तो एक को वापस लौटकर सीधे लंका चौराहे जाना पड़े।

वहाँ एक दुकान थी जिसके बाहर करीब दो सौ लोग भूखे शेरों की तरह खड़े थे। कड़ाही में शुद्ध देसी घी में कचौड़ियाँ छन रही थीं। दुकानदार का नाम था—’छोटू बाबा’। छोटू बाबा बिना बनियान के, सिर्फ एक धोती पहने, पसीने से तरबतर होकर कचौड़ी छान रहे थे।

क्रिस्टोफर ने अपनी जेब से एक ‘सैनिटाइटर’ निकाला, अपने हाथ साफ किए और छोटू बाबा से अंग्रेजी में पूछा, “मिस्टर छोटू, डू यू हैव एनी हाइजीन सर्टिफिकेट फ्रॉम द गवर्नमेंट? (क्या आपके पास सरकार का कोई स्वच्छता प्रमाण पत्र है?)”

छोटू बाबा ने कड़ाही से जलती हुई कचौड़ी निकाली, सीधे क्रिस्टोफर के सामने पत्तल पर रखी और बोले, “साहेब! हमारा सर्टिफिकेट ई सामने खड़ी भीड़ है। ई जो पसीना देख रहे हैं न? ई पसीना नहीं है, ई कचौड़ी का ‘सीक्रेट मसाला’ है! जो एक बार खाएगा, वो बार-बार आएगा। और रही बात सरकार की, तो कल यहाँ के कोतवाल साहब खुद दो प्लेट पैक करा के ले गए हैं। अब खाओगे कि लैक्चर दोगे?”

कतवारू गुरु ने कोहनी मारी—”खा लो गुरु, नहीं तो बाबा खिसिया जाएंगे (गुस्सा हो जाएंगे)।”

क्रिस्टोफर ने डरते-डरते एक कचौड़ी का टुकड़ा मुँह में डाला। कचौड़ी का तीखापन और हींग का ब्लास्ट सीधे क्रिस्टोफर के मेडुला ओबलोंगाटा (दिमाग के पिछले हिस्से) से होता हुआ पेट में उतरा। पहले पाँच सेकंड तो क्रिस्टोफर को लगा कि उनके पेट में कोई परमाणु बम फट गया है, लेकिन छठे सेकंड उनके मुँह से निकला—”ओह माय गॉड! दिस इज हेवनली!”

उन्होंने तुरंत अपनी डायरी में लिखा: “Banarasi street food defies all laws of global hygiene, but the taste stimulates the hidden dimensions of human consciousness. Note: Keep antacids ready for the night.”

रिसर्च के दूसरे हफ्ते क्रिस्टोफर को लगा कि जब तक वे बनारस के प्रसिद्ध ‘शिव तत्व’ और ‘प्रसाद’ (भांग) को नहीं चखेंगे, उनकी मानवविज्ञानी रिसर्च अधूरी रहेगी। वे कतवारू गुरु के साथ गोदौलिया के सरकारी भांग के ठेके पर पहुँचे।

क्रिस्टोफर ने बहुत होशियारी दिखाते हुए कहा, “आई वांट द मोस्ट साइंटिफिकली प्रिपेयर्ड कैनबिस (भांग)।”

दुकानदार ने उन्हें ‘स्पेशल विजया ठंडाई’ बनाकर दी। क्रिस्टोफर ने उसे किसी प्रोटीन शेक की तरह एक सांस में पी लिया। पीने के बाद वे बोले, “इट्स जस्ट मिल्क एंड नट्स। नथिंग स्पेशल।”

कतवारू गुरु मुस्कुराए और बोले, “गुरु, बनारस की भांग ‘बुलेट’ नहीं है जो तुरंत मार दे। ई ‘टाइम बम’ है। आराम से घाट की सीढ़ियों पर चलिए, वहीं फटेगा।”

ठीक पैतालीस मिनट बाद, जब क्रिस्टोफर केदार घाट पर बैठे थे, अचानक उनके चेहरे का रंग गुलाबी से बैगनी होने लगा। उन्हें लगा कि गंगा नदी ऊपर की तरफ बह रही है और आसमान में उड़ने वाली चीलें उनसे हार्वर्ड के इकोनॉमिक्स सिलेबस के बारे में पूछ रही हैं।

क्रिस्टोफर धीरे से उठे, अपने दोनों हाथ हवा में फैलाए और घाट पर घूम रहे एक मोटे, काले सांड के सामने घुटनों के बल बैठ गए। क्रिस्टोफर ने सांड की आँखों में आँखें डालीं और रोते हुए बोले, “ओह वाइस ओल्ड मैन! (ओह बुद्धिमान वृद्ध पुरुष!) मुझे पता है कि तुम ही पिछले जनम में मेरे हार्वर्ड के डीन थे! तुम्हारी आँखें बिल्कुल वैसी ही हैं। मुझे माफ कर दो, मैंने अपनी थीसिस समय पर जमा नहीं की थी!”

सांड ने क्रिस्टोफर को देखा, एक बार ‘हूँ’ किया और अपनी पूंछ क्रिस्टोफर के गाल पर मारकर आगे बढ़ गया। क्रिस्टोफर वहीं सीढ़ियों पर लेट गए और जोर-जोर से हंसने लगे—”आई हैव फाउंड द साल्वेशन! आई हैव फाउंड द मोक्ष!”

कतवारू गुरु बगल में बैठकर चुपचाप उनका वीडियो बना रहे थे और सोच रहे थे, “चलो, एक और गोरा तर गया! अब इसका वीडियो दिखा के इससे पाँच सौ रुपया और झटकेंगे।”

तीन महीने का समय बीत गया। क्रिस्टोफर का वीसा खत्म होने की कगार पर था। उनका शरीर अब कचौड़ी और मलाई योगा करके थोड़ा भारी हो गया था। गोरा रंग धूप और घाट की हवा खाकर थोड़ा ‘पक्का’ हो चुका था। कंधे पर अब हार्वर्ड का ब्रांडेड बैग नहीं, बल्कि पाँच सौ रुपये वाला बनारसी झोला था, जिस पर लाल रंग से ‘महाकाल’ लिखा था।

लौटने की आखिरी शाम, वे अस्सी घाट पर पप्पू की अड़ी पर बैठे थे। उनका लैपटॉप बैग में बंद था, और वे हाथ में कुल्हड़ लेकर चाय की चुस्की ले रहे थे।

क्रिस्टोफर ने कतवारू गुरु को देखा और बोले, “कतवारू, जब मैं अमेरिका से आया था, तो मेरे पास बहुत सारे सवाल थे और बहुत सारा डेटा था। आज मेरे पास कोई डेटा नहीं है, और कोई सवाल भी नहीं है।”

कतवारू गुरु ने चाय का घूंट लिया और बोले, “तो क्या समझे डॉक्टर साहब? कुछ खोपड़ी में घुसा या सब बाउंस कर गया?”

क्रिस्टोफर ने मुस्कुराकर अपनी शुद्ध अमेरिकी अंग्रेजी में थोड़ा बनारसी पुट मिलाते हुए कहा:

“मैं यह समझा कि दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वो जो जिंदगी को ‘सॉल्व’ (हल) करना चाहते हैं, जैसे हम वेस्टर्न लोग। और दूसरे वो, जो जिंदगी को सिर्फ ‘इन्जॉय’ करते हैं, जैसे बनारसी लोग। वेस्टर्न लोग मरने के बाद हेवन (स्वर्ग) जाना चाहते हैं, और बनारसी लोग जीते जी मणिकर्णिका को देखकर मुस्कुराते हैं कि—’चलो, टिकट तो यहीं का कटना है, तो अभी काहे का टेंशन!’ यहाँ लाइफ कोई प्रॉब्लम नहीं है गुरु, लाइफ एक ‘शाश्वत नौटंकी’ है, जिसका मजा सिर्फ कुल्हड़ की चाय और बनारसी पान के साथ ही लिया जा सकता है।”

क्रिस्टोफर विल्सन हार्वर्ड लौट गए। उन्होंने जो रिपोर्ट जमा की, उसका कोई भी हिस्सा अमेरिकी सरकार को समझ नहीं आया, क्योंकि उसमें केवल ग्राफिक्स की जगह घाटों की तस्वीरें थीं और निष्कर्ष में केवल एक ही लाइन लिखी थी:

“Don’t try to understand Banaras. Just go there, find a guide named Katwaru Guru, open your mouth for a paan, and let the city digest you.” बनारस को समझने की कोशिश मत करो। बस वहाँ जाओ, कतवारू गुरु नाम का गाइड ढूंढो, पान के लिए मुँह खोलो, और शहर को तुम्हें पचाने दो…❤️🌻😂

(बनारसी सुकून फेसबुक पेज से साभार।)

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