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Poem। कविता/ माँ/ धीरज कुमार

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माँ तो होती है बस – “माँ” ।
माँ जैसी हीरा मिले कहाँ ।।
इनकी तो बस बच्चों में ही है जहां ।।।

हर कुछ करती,
अपने बच्चों की खातिर ।
चाहे हो कोई भी माँ ,
यह बात है जाहिर।।

माँ तो बच्चों की खातिर,
हर कुछ करने को रहती तैयार ।
वह तो गाली बात क्या ,
खा लेती है मार।।
ऐसी माँ को कभी
मत करना लाचार ।
माँ की आँचल में ही,
समझना अपना संसार।।

माँ है एक अनमोल धन ।
इसे समझने का करो जतन।।
इससे बड़ा न इस जहां में कोई रतन।

धीरज कुमार
छात्राध्यापक,
ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा                        भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, लालूनगर, मधेपुरा

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