विषय : बिहार में स्रातक महाविद्यालयों के प्रस्तावित पुनर्गठन तथा उससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता एवं राज्य की उच्च शिक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव के संबंध में प्रतिवेदन।
आदरणीय डॉ. संजीव कुमार सिंह सहित विधान परिषद के सभी माननीय सदस्यों के प्रति बहुत-बहुत आभार।
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उच्च शिक्षा में बड़े बदलाव पर सत्ता पक्ष ने ही उठाए बड़े सवाल
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211 नए डिग्री कॉलेजों के नियमन को लेकर जदयू-भाजपा के विधान परिषद सदस्यों ने मुख्यमंत्री को लिखा तीन पेज का पत्र, कहा—पहले व्यापक विमर्श हो, फिर बने कानून
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खबर का सार : बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था में प्रस्तावित सबसे बड़े संरचनात्मक बदलाव पर सत्ता पक्ष के भीतर से ही गंभीर सवाल उठे हैं।
जदयू और भाजपा के बिहार विधान परिषद सदस्यों ने मुख्यमंत्री को तीन पृष्ठ का विस्तृत पत्र लिखकर 211 नए सरकारी डिग्री कॉलेजों के नियमन, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता तथा प्रस्तावित विश्वविद्यालय संशोधन पर व्यापक विमर्श की मांग की है।
सदस्यों का कहना है कि यह केवल 211 नए डिग्री कॉलेजों का मामला नहीं, बल्कि बिहार की पूरी विश्वविद्यालय व्यवस्था, उसकी स्वायत्तता और उच्च शिक्षा के भविष्य से जुड़ा विषय है। इसलिए किसी भी आमूलचूल बदलाव से पहले सभी हितधारकों से व्यापक परामर्श, प्रस्तावित संशोधनों को सार्वजनिक करने और विशेषज्ञों की राय लेने के बाद ही निर्णय लिया जाना चाहिए।
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बिहार में 211 नए सरकारी डिग्री कॉलेजों के संचालन और उच्च शिक्षा व्यवस्था में प्रस्तावित बड़े बदलाव को लेकर सत्ता पक्ष के भीतर से ही महत्वपूर्ण आवाज उठी है। जदयू और भाजपा के बिहार विधान परिषद सदस्यों ने संयुक्त रूप से मुख्यमंत्री को तीन पृष्ठ का विस्तृत पत्र लिखकर विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, अंगीभूत महाविद्यालयों की वर्तमान व्यवस्था तथा प्रस्तावित कानून के दूरगामी प्रभावों पर पुनर्विचार का आग्रह किया है।
पत्र पर सत्ता पक्ष के दोनों प्रमुख घटकों—जदयू और भाजपा—के विधान परिषद सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। पत्र लिखनेवाले हैं – संजीव कुमार सिंह, संजय कुमार सिंह विधायक, नीरज कुमार, अफ़ाक़ अहमद, डॉ वीरेंद्र नारायण यादव, जीवन कुमार। राजनीतिक और शैक्षणिक हलकों में इसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है, क्योंकि सत्ता पक्ष के सदस्यों ने ही प्रस्तावित उच्च शिक्षा सुधारों पर औपचारिक रूप से अपनी चिंताएं और सुझाव मुख्यमंत्री के समक्ष रखे हैं।
क्या है पूरा मामला
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पत्र में 15 जुलाई को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित उस रिपोर्ट का उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया था कि राज्य सरकार ऐसा विधेयक लाने पर विचार कर रही है, जिसके तहत विश्वविद्यालयों के अंगीभूत (Constituent) स्नातक महाविद्यालयों को विश्वविद्यालयों से अलग कर उच्च शिक्षा विभाग के अधीन नई व्यवस्था में संचालित किया जा सकता है।
विधान परिषद सदस्यों का कहना है कि यह केवल 211 नए सरकारी डिग्री कॉलेजों के नियमन का प्रश्न नहीं, बल्कि बिहार की पूरी उच्च शिक्षा व्यवस्था की संरचना बदलने का विषय है।
पूरी विश्वविद्यालय व्यवस्था दांव पर
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पत्र में कहा गया है कि विश्वविद्यालय केवल प्रशासनिक संस्थाएं या डिग्री प्रदान करने वाले निकाय नहीं हैं। वे शिक्षण, अनुसंधान, ज्ञान सृजन, पाठ्यक्रम निर्माण, परीक्षा संचालन, नियुक्ति, मूल्यांकन और शैक्षणिक गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाली एकीकृत अकादमिक व्यवस्था हैं।
अंगीभूत महाविद्यालयों को विश्वविद्यालयों से अलग करने से दशकों में विकसित यह समन्वित शैक्षणिक ढांचा प्रभावित हो सकता है और विश्वविद्यालयों की मूल भूमिका कमजोर पड़ सकती है।
स्नातक से शोध तक की शैक्षणिक निरंतरता टूटने की आशंका
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पत्र में कहा गया है कि वर्तमान व्यवस्था में विश्वविद्यालय स्नातक, स्नातकोत्तर और शोध कार्यक्रमों के बीच शैक्षणिक निरंतरता बनाए रखते हैं। पाठ्यक्रम, परीक्षा, शोध और गुणवत्ता नियंत्रण का पूरा ढांचा एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है।
यदि महाविद्यालय अलग प्रशासनिक ढांचे में चले जाते हैं तो यह समन्वय कमजोर होगा और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
लोकतांत्रिक विश्वविद्यालय व्यवस्था पर असर की चिंता
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विधान परिषद सदस्यों ने आशंका जताई है कि प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने पर शिक्षकों के स्थानांतरण, पदस्थापन, प्रशासनिक नियंत्रण और संस्थागत संचालन जैसे अधिकार विश्वविद्यालयों के वैधानिक निकायों से निकलकर कार्यपालिका के अधीन चले जाएंगे।
इससे एकेडमिक काउंसिल, सिंडिकेट तथा अन्य वैधानिक निकायों की भूमिका सीमित हो सकती है, जबकि परंपरागत रूप से यही संस्थाएं विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक निर्णय लेती रही हैं।
बिहार की विशिष्ट विश्वविद्यालय व्यवस्था का भी उल्लेख
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पत्र में कहा गया है कि बिहार की विश्वविद्यालय प्रणाली देश के अन्य राज्यों से कई मायनों में अलग है। यहां बड़ी संख्या में अंगीभूत महाविद्यालय विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक पहचान का हिस्सा हैं और राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था दशकों में विकसित इस मॉडल पर आधारित है।
कई अंगीभूत महाविद्यालय राष्ट्रीय स्तर पर उल्लेखनीय शैक्षणिक उपलब्धियां हासिल कर चुके हैं। ऐसे संस्थागत ढांचे में बड़े बदलाव से पहले व्यापक अध्ययन और विमर्श आवश्यक बताया गया है।
एनईपी-2020 और देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों का हवाला
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पत्र में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी-2020) का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि नई शिक्षा नीति विश्वविद्यालयों को अधिक शैक्षणिक एवं प्रशासनिक स्वायत्तता देने पर बल देती है। #दिल्ली विश्वविद्यालय, #जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, #बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और #हैदराबाद विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि मजबूत विश्वविद्यालय व्यवस्था ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार की आधारशिला होती है।
दानदाताओं की भावना का भी उठाया मुद्दा
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पत्र में कहा गया है कि बिहार के अनेक अंगीभूत महाविद्यालय समाजसेवियों और दानदाताओं द्वारा शिक्षा के उद्देश्य से उपलब्ध कराई गई भूमि पर स्थापित हुए थे। बाद में इन्हें विश्वविद्यालयों का अंगीभूत महाविद्यालय बनाया गया।
नई व्यवस्था उन मूल उद्देश्यों, सामाजिक दायित्वों और दानदाताओं की भावना के भी प्रतिकूल हो सकती है।
पहले कमियां दूर करें, फिर करें संरचनात्मक बदलाव
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पत्र में कहा गया है कि यदि विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक, शैक्षणिक अथवा वित्तीय कमियां हैं तो पहले उनके वास्तविक कारणों की पहचान कर सुधार किया जाए। सदस्यों ने यह भी उल्लेख किया है कि पिछले वर्षों में विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक, शैक्षणिक और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आए, जिससे छात्रों, शिक्षकों और समाज में नकारात्मक संदेश गया। इसके बावजूद गंभीर मामलों में कुलपतियों के विरुद्ध अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे में पूरे विश्वविद्यालय अधिनियम में व्यापक बदलाव करने से पहले मौजूदा व्यवस्था को प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।
पत्र की तीन प्रमुख मांगें
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1. विश्वविद्यालयों, शिक्षकों, छात्र संगठनों, शिक्षाविदों तथा अन्य सभी हितधारकों से व्यापक परामर्श किए बिना किसी भी विधेयक को अंतिम रूप नहीं दिया जाए।
2. बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों का मसौदा सार्वजनिक पोर्टल पर जारी कर विशेषज्ञों और आम नागरिकों से सुझाव लिए जाएं।
3. विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, लोकतांत्रिक संरचना और शैक्षणिक स्वतंत्रता को सुरक्षित रखते हुए ही किसी नई व्यवस्था पर निर्णय लिया जाए।
क्यों महत्वपूर्ण है यह पत्र
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यह पत्र केवल प्रशासनिक सुझाव नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के भीतर से आया एक महत्वपूर्ण संस्थागत हस्तक्षेप माना जा रहा है। जदयू और भाजपा के विधान परिषद सदस्यों ने सरकार से आग्रह किया है कि बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था में किसी भी आमूलचूल बदलाव से पहले उसके शैक्षणिक, प्रशासनिक और सामाजिक प्रभावों का गंभीर अध्ययन किया जाए।
पत्र का केंद्रीय संदेश यही है कि यदि उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार आवश्यक हैं तो सुधार किए जाएं, लेकिन विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, लोकतांत्रिक संरचना, शैक्षणिक गुणवत्ता और संस्थागत संतुलन को प्रभावित करने वाले किसी भी बड़े बदलाव से पहले व्यापक सहमति, सार्वजनिक विमर्श और विशेषज्ञों की राय अनिवार्य रूप से ली जाए। यही कारण है कि 211 नए सरकारी डिग्री कॉलेजों का मुद्दा अब केवल नए संस्थानों के संचालन तक सीमित नहीं, बल्कि बिहार की पूरी विश्वविद्यालय व्यवस्था और उच्च शिक्षा के भविष्य से जुड़ी एक बड़ी नीति-बहस बन गया है।
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वरिष्ठ पत्रकार श्री स्वयं प्रकाश जी के फेसबुक वॉल से साभार।














