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चंद्रशेखर : मैं राजनीति में लोकप्रिय होने नहीं आया!

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चंद्रशेखर : मैं राजनीति में लोकप्रिय होने नहीं आया!

राज खन्ना

चंद्रशेखर देश की राजनीति के उन दुर्लभ नेताओं में थे जिन्होंने निजी लोकप्रियता से अधिक उस बात को तरजीह दी ,जिसे वे सही समझते थे। अपनी पार्टी – अपनी सरकार ही नहीं बल्कि ऐसे भी मौके आए जब वे जनभावनाओं के विपरीत बोलने का खतरा उठाने में नहीं चूके। संख्या बल के लिहाज से बेशक वे कमजोर दिखे। एक दौर में तो अकेले जैसे। लेकिन वे अकेले ही कितने बड़े और भारी थे , इसका गवाह सदन भी है और वह हर छोर जहां तक वे या उनकी आवाज पहुंची। उन्होंने राजनीति को नफे – नुकसान के पलड़ों में नहीं तौला। कितने दिन वे प्रधानमंत्री रहे या सत्ता से दूर रहे इसके जोड़ की जगह इस बात की अहमियत है कि वे जब भी बोले तो गौर से सुने गए। हमेशा प्रासंगिक रहे। यहां तक कि जाने के बाद भी याद किए जाते हैं।

युवातुर्क की पहचान लिए चंद्रशेखर की कांग्रेस में बड़ी हैसियत थी। चुनाव लड़कर वर्किंग कमेटी के सदस्य बने थे। इंदिराजी की कैबिनेट में जगह मिल सकती थी। लेकिन 1974 -75 के हंगामखेज दौर में उन्होंने जरूरी समझा कि शांति और प्रगति के लिए आंदोलनों और टकराव का सिलसिला थमना चाहिए। मोरारजी जिनसे कांग्रेस में रहते वे हमेशा असहमत रहे , गुजरात के सवाल पर उनका अनशन तुड़वाने के लिए वे उनके और इंदिरा जी के बीच पुल बन गए। जेपी और इंदिरा गांधी के बीच की दूरियां पाटने और संवाद शुरू कराने की कोशिशों में वे इंदिरा जी से दूर हो गए। इस हद तक कि अपनी ही पार्टी की सरकार के समय इमरजेंसी में जेल पहुंच गए। लेकिन जेल से निकलने के बाद भी इंदिरा जी के प्रति उन्होंने कोई व्यक्तिगत कटुता नहीं रखी। 1977 के चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई। लेकिन जनता पार्टी शासन में इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी का विरोध किया। इंदिरा जी जब अपने बंगले के खाली होने के बाद कहाँ रहूंगी को लेकर परेशान थीं तो चंद्रशेखर ने मोरारजी से इसके लिए बात की। उन दिनों इंदिरा जी के प्रति खासतौर पर जनता पार्टी और उसके समर्थकों में जैसी नाराजगी थी, ऐसे समय में चंद्रशेखर की इंदिरा जी के प्रति सदाशयता एक बड़े वर्ग को खिन्न कर रही थी, लेकिन चंद्रशेखर ने इसकी फिक्र किए बिना वही किया और कहा जिसे सही समझा।

1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार का विरोध करके वे लगभग अकेले पड़ गए थे। लेकिन आलोचनाओं से बेपरवाह चंद्रशेखर अपनी राय पर अडिग रहे। उनका कहना था कि धार्मिक स्थल में सेना भेजना अंतिम विकल्प भी नहीं होना चाहिए। इस सिलसिले में संसद और अन्य जगहों के भाषणों में समस्या के राजनीतिक समाधान खोजने में सरकार की विफलता की उन्होंने आलोचना की थी। जोर दिया था कि बंदूक किसी राजनीतिक समस्या का स्थायी समाधान नहीं दे सकती। सचेत किया था कि इस कार्रवाई से देश की एकता पर दीर्घकालीन दुष्प्रभाव पड़ेंगे। अलोकप्रिय होने की चंद्रशेखर ने कभी परवाह नहीं की। 1998 के परमाणु परीक्षण का यह कहते हुए उन्होंने समर्थन नहीं किया कि राष्ट्रवाद का अर्थ केवल परमाणु विस्फोट नहीं है।एक अन्य टिप्पणी में उन्होंने कहा कि भारत की असली ताकत उसकी जनता है, परमाणु बम नहीं। कोयला माफिया कहे जाने वाले सूरजदेव सिंह से उन्होंने अपने संबंध नहीं छिपाए । साफ कहा मैं उसे जानता हूँ। यदि किसी से मिलता हूँ तो उसे छिपाता नहीं। यह भी कहा कि किसी व्यक्ति से मिलने भर से मैं उसके हर काम का भागीदार नहीं हो जाता। उनका तर्क था कि जनप्रतिनिधि का काम समाज के हर वर्ग से संवाद रखना है।

सिद्धांतों के लिए लड़ने – अड़ने वाले चंद्रशेखर ने 1990 में वी.पी. सिंह की सरकार के पतन के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली। उनके इस फैसले ने उनकी राजनतिक छवि पर अनेक सवाल खड़े किए। इस सरकार के पास सिर्फ 64 सांसद थे। उस कांग्रेस का समर्थन था, जिसने सिर्फ दशक भर पहले चौधरी चरण सिंह को समर्थन देने के बाद संसद का सामना करने का भी मौका नही दिया था। फिर चन्द्रशेखर ने क्यों बनायी सरकार ? अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा,” मैंने सरकार बनाने की जिम्मेदारी इसलिए स्वीकार की, क्योंकि उस समय देश की हालत बहुत खराब थी। दो तरह के दंगे-फसाद चल रहे थे – साम्प्रदायिक और सामाजिक। मैंने 11 नवम्बर 1990 को शपथ ली। उस समय 70-75 जगहों पर कर्फ्यू लगा हुआ था। युवक आत्मदाह कर रहे थे। वे मंडल आयोग की सिफारिशों के खिलाफ़ भड़क गए थे। दूसरी तरफ साम्प्रदायिक दंगे हो रहे थे। मुझे सरकार चलाने का अनुभव नही था लेकिन मेरा विश्वास था कि अगर देश के लोगों से सही बात की जाए तो जनता देश के भविष्य के लिए सब कुछ करने को तैयार रहेगी। ” उन्होंने कुल सात महीने पद संभाला , जिसमें तीन महीने कामचलाऊ प्रधानमंत्री के तौर पर शामिल थे। कांग्रेस ने राजीव गांधी की जासूसी का आरोप लगाते हुए सरकार से समर्थन वापस लिया था। चन्द्रशेखर के अनुसार जासूसी का बहाना उन्हें दबाव में लेने के लिए बनाया गया। उन्होंने नही सोचा था कि मैं इस्तीफा दे दूंगा! लोकसभा में जबाब देने के लिए मैं खड़ा हुआ, उस समय देवीलाल जी ने मुझसे कहा कि राजीव गांधी जी बात करना चाहते हैं। मैं जाऊं? मैंने कहा जरुर जाइये और अपनी प्राइममिनिस्टरी की बात करके आइएगा। मेरे दिन इस पद पर पूरे हो गए। मैं एक बार फैसला लेता हूं। फिर उस पर कायम रहता हूं।

आगे के राजनीतिक सफ़र में चंद्रशेखर लगभग अकेले थे। उनकी पार्टी सजपा उठ नहीं सकी। लेकिन उस अकेलेपन में भी सड़क से संसद तक चन्द्रशेखर जहां भी खड़े हुए, वहाँ वे अलग दिखे। जीवन के आखिरी दौर में उन्हें संसद का घटता महत्व चिंतित किये हुए था। न्यायपालिका से विधायिका के टकराव को लेकर भी उनका नजरिया बहुत साफ़ था। अपने साक्षात्कारों की किताब ‘ रहबरी के सवाल ‘ में वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय से उन्होंने कहा था , ‘ देखिए संसद सबसे बड़ी है। इस देश में संसद को मछली बाजार और नेताओं को भ्रष्टाचार का मसीहा कहने का किसी को अधिकार नहीं है। न्यायपालिका का अस्तित्व तभी तक है जब तक संसद मजबूत है। पड़ोसी देश का उदाहरण हमारे सामने है। जहाँ पर भी संसद कमजोर हुई, वहाँ न्यायपालिका मजबूत नही रह सकी है। हमारा विरोध सिर्फ इस बात का है कि राजनीतिक लोग भ्रष्ट हैं। लेकिन संसद भ्रष्टाचार का अड्डा है, कहना लोकतंत्र की जड़ पर कुठाराघात है। अगर जड़ ही नहीं रहेगी तो शेष क्या बचेगा ? लोकतंत्र में अगर संसद को निकाल दें तो फिर क्या बचता है ? वे अक्सर कहते थे, संसद सरकार की प्रशंसा के लिए नहीं, उसे जवाबदेह बनाने के लिए है।लोकतंत्र में असहमति देशद्रोह नहीं होती। उनकी शख्सियत की सबसे बड़ी खूबी उनकी साफगोई थी। वे कहते थे,मैं लोकप्रिय होने के लिए राजनीति में नहीं आया हूँ। …. और उन्होंने सिर्फ कहा नहीं कि सही बात कहने की कीमत चुकानी पड़ती है – बल्कि बिना मलाल किए इसे चुकाया भी !
17 अप्रैल 1927 को उनका जन्म और 8 जुलाई 2007 को निधन हुआ।

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