Ram रामचर्चा : इन सवालों पर सोचना चाहिए। प्रेमकुमार मणि। पटना

रामचर्चा : इन सवालों पर सोचना चाहिए 

-प्रेमकुमार मणि, पटना

 

याद कर सकता हूँ 1980 का दशक जब नवोदित भारतीय जनता पार्टी ( स्थापना 6 अप्रैल 1980) को अपने प्रथम आमचुनाव में केवल दो सीटों से संतोष करना पड़ा था. उसकी मातृ-संस्था जनसंघ की भी ऐसी दुर्गति कभी नहीं हुई थी. जनता पार्टी के साथ समाजवादियों और गांधीवादियों की सोहबत में दो-ढाई साल तक रहने का प्रभाव यह हुआ कि भाजपा ने गांधीवादी समाजवाद को अपना आर्थिक लक्ष्य रखा. भाजपा नेताओं के मन में 1955 के अवाडी अधिवेशन में कांग्रेस द्वारा लिए गए समाजवादी ढाँचे की अर्थव्यवस्था जैसा कोई सपना रहा होगा. लेकिन नतीजा अच्छा नहीं हुआ. और यहीं से भाजपा ने राममंदिर मामले में दिलचस्पी लेनी शुरू की. बाद का सब कुछ इतिहास के सामने स्पष्ट है. 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद का ढांचा ध्वस्त किया गया और अब उसके कोई बत्तीस साल बाद प्रस्तावित राममंदिर अगले 22 जनवरी को एक स्वरूप लेने जा रहा है.

 

मैं समझता हूँ इस मामले को लेकर भारतीय समाज में कभी सम्यक विमर्श नहीं हुआ. यह मान लेने से काम नहीं चलने वाला कि गलतियां केवल भाजपा या उनके समर्थक अंध हिंदूवादियों से हुई. मैं समझता हूँ गलतियां कई तरफ से हुईं. कांग्रेस को कम से कम अपनी गलती का एहसास तो करना ही चाहिए. क्योंकि उसी के शासनकाल में जन्मभूमि का ताला भी खुला और विवादित ढांचा भी ध्वस्त हुआ. कांग्रेस को दोनों पक्षों को आमने-सामने बैठा कर संवाद करवाना और समस्या का हल निकालना चाहिए था. लेकिन कांग्रेस सहित दूसरे सेकुलर लोग बाबरी मस्जिद का औचित्य सिद्ध करने में लगे थे. इसमें कोई दो राय नहीं कि अयोध्या और मथुरा एक समय बौद्ध गढ़ थे. लेकिन यह भी सत्य है कि बौद्धों के पतन के बाद वहां सनातनियों ने अपना प्रभाव बढा लिया था. मुसलमानों ने हिन्दू धर्मस्थलों को ही ध्वस्त किया था. पराजित समाज को यह पीडा झेलनी ही होती थी. यह पूरी दुनिया में हुआ था. लेकिन यह मध्य काल की बात थी. मैंने अपने किशोर-काल में देखा था कि धन,धरती और धर्म की रक्षा केलिए जनसंघ को वोट दो के पोस्टर पर जनता कोई ध्यान नहीं देती थी. लेकिन यही धर्म आज राजनीति का केंद्रीय तत्व कैसे हो गया?

 

क्या 1980 के दशक में केवल भाजपा ने ही कट्टर हिंदुत्व के फलसफे को अपनाया? याद कीजिए उस वक़्त कांग्रेस क्या कर रही थी और समाजवादी-साम्यवादी क्या कर रहे थे? वही समय था जब कांग्रेस ने शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नकारने वाला अध्यादेश लाया ताकि मुसलमानों के रूढ़िवादी हिस्से का समर्थन किया जा सके. इसे बैलेंस करने के लिए लगे हाथ जन्मभूमि का ताला भी खुलवा दिया गया. यानि मुसलमानों और हिन्दुओं के मजहबी तत्वों को एक साथ साधने की कोशिश की गई. यह कांग्रेस की नीति नहीं थी. जवाहरलाल नेहरू के समय से यही चला आ रहा था कि कांग्रेस संविधान को देखेगी, न कि धार्मिक मान्यताओं और विश्वासों को. कांग्रेस ने शायद भाजपा से प्रतिद्वंदिता करनी चाही. और एक दफा जब वह भाजपा के अखाड़े में चली गई तो उसका सत्यानाश होना अवश्यम्भावी था. इसलिए कि भाजपा उस अखाडे की ही खिलाडी थी. यही हुआ.

 

कांग्रेस ने मुस्लिम रूढी- वादियों को साधने की कोशिश की तो, समाजवादियों ने मौके का फायदा उठाने केलिए मुसलमानों के असामाजिक तत्वों को अपने साथ किया, जिनका अस्मितावादी दौर में प्रभाव बढ़ा था. अंततः मुस्लिम मतदाताओं को कांग्रेस से अलगा दिया. दलित वोटों पर इसी दशक में उभरे कांशीराम जैसे आम्बेडकरवादियों का प्रभाव बढ़ रहा था. दलितों के कांग्रेस से छिटकते ही भाजपा और समाजवादी हिंदी इलाकों में आमने-सामने हो गए और कांग्रेस लगातार पीछे होने लगी. इस हिंदी-पट्टी में पिछड़ते ही वह राष्ट्रीय स्तर पर पिछड़ने लगी. इन परिस्थितियों में भाजपा का शनैः शनैः विस्तार होता गया. यह स्वाभाविक था.

 

कट्टर सेक्युलरवादियों का एक अलग मोर्चा था. राम का तो कोई अस्तित्व ही नहीं था और कि बाबरी मस्जिद के ढाँचे की रक्षा होनी चाहिए जैसे वक्तव्यों से वह शुरू होते थे और हर बात में एक किताब पटक देते थे. लालू प्रसाद ने लालकृष्ण आडवाणी को सोमनाथ यात्रा सिलसिले में जब गिरफ्तार किया और मुलायम सिंह ने अयोध्या जा रहे कारसेवकों पर जब जानलेवा गोलियां चलवाईं तो लोगों ने लालू और मुलायम की पीठ थपथपाई. यह नहीं समझा कि मंदिर अभियान को इन्होने शहीदी जत्थे में रूपांतरित कर दिया है और उसे एक संग्राम का रूप दे दिया है. पुराने कम्युनिस्ट मतावलम्बी सैयद शहाबुद्दीन ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी बना कर इस पूरी लड़ाई को धर्मयुद्ध में तब्दील कर दिया. भाजपा को अनजाने ही सफलताएं मिलने लगीं. 1989 के लोकसभा चुनाव में उसे उल्लेखनीय सफलता मिली थी. उसके बाद उसने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. इस बीच छह वर्षों केलिए वह केन्द्र सरकार में भी आई. 2014 से वह लगातार केंद्रीय सरकार में बनी हुई है. राम मंदिर मामले में उसका हस्तक्षेप उसके लिए लाभकारी हुआ. इस बीच कम्युनिस्टों का देश की राजनीति से लगभग सफाया हो गया. समाजवादी संततियां भी बहुत हद तक हाशिए पर जा चुकी हैं और कांग्रेस अपने वजूद केलिए संघर्ष कर रही है.

इन्हीं स्थितियों में रामजन्मभूमि की प्राण-प्रतिष्ठा हो रही है. भाजपा उसका कम से कम एक बार और राजनीतिक दोहन करना चाहेगी ही. यही सोच कर चुनाव से ठीक पहले उसने आनन-फानन इस उत्सव का आयोजन सुनिश्चित करवाया है. इसका कितना फायदा उसे मिलेगा यह तो समय बताएगा,लेकिन अपनी तरफ से उसने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा है.

सवाल यह कि इस अभियान से राष्ट्र का कितना नफा-नुकसान हो रहा है. इक्किसवीं सदी की यह दुनिया क्या ऐसे धार्मिक अभियान की स्वीकृति देती है?

क्या अयोध्या को मक्का- मदीना बनाया जा रहा है, या राम मन्दिर को नेशनल चर्च के तर्ज पर विकसित निर्मित किया जा रहा है?

हम किस से लड़ रहे हैं?

किस का अनुगमन कर रहे हैं?

पाँच सौ साल पुरानी पराजय का जवाब देने में कहीं हम से गलती तो नहीं हो रही है?

हम कहीं अतीत के उन हमलावरों की तरह ही मजहबी और तंग-दिमाग तो नहीं हो रहे हैं?

भारतीय और विशेष कर हिन्दू समाज को हम आगे की बजाय पीछे तो नहीं ले जा रहे हैं ?

इन सवालों पर हमें सोचना चाहिए.