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Ram रामचर्चा : इन सवालों पर सोचना चाहिए। प्रेमकुमार मणि। पटना
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Ram रामचर्चा : इन सवालों पर सोचना चाहिए। प्रेमकुमार मणि। पटना

रामचर्चा : इन सवालों पर सोचना चाहिए  -प्रेमकुमार मणि, पटना   याद कर सकता हूँ 1980 का दशक जब नवोदित भारतीय जनता पार्टी ( स्थापना 6 अप्रैल 1980) को अपने प्रथम आमचुनाव में केवल दो सीटों से संतोष करना पड़ा था. उसकी मातृ-संस्था जनसंघ की भी ऐसी दुर्गति कभी नहीं हुई थी. जनता पार्टी के साथ समाजवादियों और गांधीवादियों की सोहबत में दो-ढाई साल तक रहने का प्रभाव यह हुआ कि भाजपा ने गांधीवादी समाजवाद को अपना आर्थिक लक्ष्य रखा. भाजपा नेताओं के मन में 1955 के अवाडी अधिवेशन में कांग्रेस द्वारा लिए गए समाजवादी ढाँचे की अर्थव्यवस्था जैसा कोई सपना रहा होगा. लेकिन नतीजा अच्छा नहीं हुआ. और यहीं से भाजपा ने राममंदिर मामले में दिलचस्पी लेनी शुरू की. बाद का सब कुछ इतिहास के सामने स्पष्ट है. 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद का ढांचा ध्वस्त किया गया और अब उसके कोई बत्तीस साल बाद प्रस्तावित राममंदिर अगले 2...
Yaden यादें बोरसी की आग की /ध्रुव गुप्त
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Yaden यादें बोरसी की आग की /ध्रुव गुप्त

यादें बोरसी की आग की /ध्रुव गुप्त सर्दी के बढ़ने के साथ हीटर या ब्लोवर्स के सामने बैठकर सर्दी से लड़ने के कुछ पारंपरिक हथियारों की याद आने लगी है। बोरसी की आग उनमें सबसे प्रमुख हुआ करती थी। शहरों में बस चुके जिन लोगों की जड़ें गांवों में हैं उन्हें जाड़े की रातों में बोरसी की आग जी स्मृतियां भूली नहीं होंगी। घर के दरवाजे पर जलती, सुलगती बोरसी का मतलब होता था शीत से संपूर्ण सुरक्षा। अब शहरों या गांवों में भी पक्के, सुंदर घरों वाले लोग धुएं से घर की दीवारें काली पड़ जाने के डर से बोरसी नहीं सुलगाते। मिट्टी और खपरैल के मकानों में ऐसा कोई डर नहीं होता था। घर के बुजुर्ग कहते थे कि दरवाजे पर बोरसी की आग हो तो ठंढ तो क्या, सांप-बिच्छू और भूत-प्रेतो का भी घर में प्रवेश बंद होता है। सार्वजनिक जगहों पर जलनेवाले अलाव जहां गांव-टोले के चौपाल कहे जाते थे, बोरसी को पारिवारिक चौपाल का दर्जा हासिल था। उसके ...
Hindi खगेंद्र ठाकुर की आज पुण्यतिथि पर विशेष….
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Hindi खगेंद्र ठाकुर की आज पुण्यतिथि पर विशेष….

एक प्रखर मार्क्सवादी चिन्तक , हिन्दी साहित्य के प्रगतिशील आंदोलन के पुरोधा और चर्चित आलोचक डॉ खगेंद्र ठाकुर की आज पुण्यतिथि है। अपनी बेहद सजग आलोचनात्मक दृष्टि के कारण खगेन्द्र जी आजीवन बिहार के लेखकों के लिए एक प्रकाश-स्तंभ की तरह रहे। मेरा उनसे आत्मीय परिचय 1995 में तब हुआ जब मैं अपनी कुछ कच्ची-पकी कविताओं की एक पांडुलिपि लेकर उनके पास गया था। मन में एक डर और संकोच था कि पता नहीं मुझ पुलिसवाले के साथ उनका सलूक कैसा हो। यह देखकर एक सुखद आश्चर्य हुआ कि उन्होंने मेरी कविताओं को न केवल एकाग्र होकर पढ़ा और सुझाव दिए, बल्कि कविता संग्रह को 'जंगल जहां खत्म होता है' का नाम भी दिया और उसकी भूमिका भी लिखी। उनकी 'समय, समाज व मनुष्य' और 'कविता का वर्तमान' जैसी किताबों ने मुझे कविता की थोड़ी-बहुत समझ दी। कम लोगों को पता है कि खगेन्द्र जी एक संवेदनशील कवि भी थे। उन्हें मेरा स्मृति नमन,उनकी एक कविता के ...