Hindi। डाॅ. बहादुर मिश्र : एक जीवंत पुस्तकालय

गुरूवर डाॅ. बहादुर मिश्र को सादर प्रणाम। अनुज द्वय मनजीत एवं आलोक को बहुत-बहुत बधाई।

डाॅ. बहादुर मिश्र की सेवानिवृत्ति के अवसर पर प्रकाशित पुस्तक ‘हमारे लिए डाॅ. बहादुर मिश्र’ में मेरा भी आलेख ‘डाॅ. बहादुर मिश्र : एक जीवंत पुस्तकालय’ प्रकाशित हुआ है।
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*डाॅ. बहादुर मिश्र : एक जीवंत पुस्तकालय*

मैं लगभग 15 वर्ष (2002-2017 तक) भागलपुर (बिहार) में रहा। वहाँ मेरा दर्जनों शिक्षकों, समाजसेवियों, रंगकर्मियों, शोधार्थियों आदि से परिचय हुआ और कई लोगों से काफी प्रगाढ़ आत्मीय संबंध कायम हुए। ऐसे लोगों में प्रो. (डॉ.) बहादुर मिश्र का नाम अग्रगण्य है।

डॉ. मिश्र से मेरी पहली मुलाकात कब और कहाँ हुई, वह ठीक-ठीक याद नहीं आ रहा है। लेकिन इतना अवश्य कह सकता हूँ कि मेरे भागलपुर प्रवास के शुरूआती दिनों से ही मुझे इनका सन्निध्य प्राप्त है।

दरअसल मैंने वर्ष 2002 में तेज नारायण बनैली महाविद्यालय, भागलपुर में स्नातक प्रतिष्ठा (दर्शनशास्त्र) में नामांकन लिया था और कुछ दिनों बाद पढ़ाई के साथ ही ‘प्रभात खबर’ अखबार में काम करना भी शुरू कर दिया था। उन दिनों प्रो. (डॉ.) रामाश्रय यादव तिलकामाँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर के कुलपति थे और डॉ. मिश्र उनके सर्वाधिक विश्वस्त सलाहकार हुआ करते थे, जो प्रवक्ता की भूमिका में भी थे। इसलिए, मेरा अक्सर विश्वविद्यालय की खबरों के सिलसिले में डाॅ. मिश्र से मिलना होता था। उस दौरान आप मेरे लिए मात्र एक अधिकारी थे और मैं संवाददाता। लेकिन उनके सहज-सरल व्यक्तित्व एवं तर्कपूर्ण वक्तव्य का प्रभाव विलक्षण था।

इसी बीच एक बार डाॅ. मिश्र मेरे अखबार ‘प्रभात खबर’ के कार्यालय आए। वहाँ आपने मेरे द्वारा लिखित किसी रिपोर्ट की अशुद्धियों को ठीक किया। तब से मैंने आपको अपना गुरू मान लिया। मैंने आपकी शोहबत में सुस्पष्ट एवं शुद्ध लिखने का अभ्यास शुरू किया, जो आज भी जारी है। मैंने आपकी सलाह पर ही ‘शुद्ध हिंदी कैसे लिखें ?’ पुस्तक भी खरीदी, जिसका मुझे काफी लाभ हुआ।

डाॅ. मिश्र काफी दिनों तक ‘दैनिक जागरण’ में अंगिका कॉलम लिखते रहे और मैं भी वहाँ फीचर लेखक के रूप में संबद्ध रहा। इस तरह दैनिक जागरण कार्यालय में भी मेरी आपसे अक्सर मुलाकातें होती थीं और मुझे काफी कुछ सीखने को मिलता था। उस दौरान आपने मुझे फीचर आलेखों के कई विषय सुझाए और मेरे कई आलेखों को भाषा एवं व्याकरण की दृष्टि से ठीक-ठाक भी किया था।

यहाँ मैं यह बताना चाहता हूँ कि मुझे हमेशा अपने मित्रों के साथ हल्की-फुल्की बातें करने की बजाय बड़े-बुजुर्गों के साथ गंभीर चर्चा अच्छी लगती है। यही कारण है कि मैं अक्सर डाॅ. मिश्र से मिलने हिन्दी विभाग जाया करता था और वहाँ अन्य शिक्षकों का भी स्नेह पाता था। विभाग के अलावा भारत बुक डिपो, भागलपुर में भी मेरी अक्सर आपसे मुलाकातें होती थीं। वहाँ मैंने आपको हमेशा विभिन्न विषयों की किताबों से आवश्यक संदर्भ खोजते और विभिन्न प्रकाशकों के ‘कैटलाॅग’ में अपनी पसंद की पुस्तकें चिह्नित कर उसका ‘ऑर्डर’ देते देखा। उसी दौरान मुझे विविध विषयों पर आपके विपुल ज्ञान एवं आपकी अद्वितीय स्मरण-शक्ति से भी परिचय हुआ, जो मेरे लिए ईर्ष्या का कारण रही है और आपके निजी पुस्तकालय की भी जानकारी मिली, जो मेरे लिए प्रतियोगिता के विषय हैं।

डाॅ. मिश्र से मेरी विभिन्न साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों में बराबर मुलाकातें होती थीं और आपके सारगर्भित वक्तव्यों से मुझे हमेशा प्रेरणा मिलती थी। ऐसे आयोजनों का एक प्रमुख केंद्र गाँधी शांति प्रतिष्ठान था। वहाँ डाॅ. मिश्र की पुस्तक ‘गाँधी को कितना जानते हैं?’ का लोकार्पण भी हुआ था और लोकार्पण के बाद मैंने ही प्रेस-विज्ञप्ति लिखी थी। इस तरह विभिन्न जगहों पर डाॅ. मिश्र का सानिध्य पाकर मैं लगातार वैचारिक पोषण पाता रहा और मेरी भाषायी दुर्बलता कम हुई।

मेरा डाॅ. मिश्र के साथ गहरा लेखकीय तल्लुकात भी रहा है। आपने मेरे आग्रह पर मेरी किताब ‘लोकतंत्र : मिथक और यथार्थ’ के लिए ‘लोकतंत्र का विकल्प’ विषयक अपना आलेख उपलब्ध कराया था। आपने मेरी पुस्तक ‘गाँधी-विमर्श’ के लिए भी ‘एक शानदार समीक्षात्मक लेख लिखा था, लेकिन वह टाईपिस्ट की लापरवाही से खो गया, जिसका मुझे जीवनभर मलाल रहेगा। आपने मुझे भी कई बार लेखन का अवसर उपलब्ध कराया है। आपके संयोजन में आयोजित ‘स्त्री चेतना और नारीवादी लेखन’ (2008) विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में मैंने अपने शोधार्थी जीवन का एक शुरूआती शोध-पत्र प्रस्तुत किया था। मुझे आपकी पुस्तक ‘कवि रवीन्द्र : साहित्यकारों की दृष्टि में’ की समीक्षा लिखने का सौभाग्य भी प्राप्त है।

डाॅ. मिश्र का मेरे पीएच. डी. शोध में भी महत्वपूर्ण योगदान है। आपकी सलाह पर ही मैंने अपने शोध-प्रारूप में विषय के मुख्य शब्द ‘सामाजिक-न्याय’ को ठीक कर ‘सामाजिक न्याय’ बनाया। साथ ही उनकी सलाह पर ही मैंने अपने शोध-प्रारूप के सभी अध्यायों को डाॅ. अंबेडकर की दृष्टि से लिखा। इससे मैं अपने विषय (वर्ण-व्यवस्था और सामाजिक न्याय : डाॅ. भीमराव अंबेडकर के विशेष संदर्भ में) के साथ न्याय कर सका। अन्यथा मेरे मूल शोध-प्रारूप में डाॅ. अंबेडकर को लेकर सिर्फ एक-दो अध्याय ही थे।

दरअसल डाॅ. मिश्र स्वभाव से ही भाषायी वैद्य हैं। जैसे कोई योग्य वैद्य रोगी को देखते ही उसकी बीमारी पहचान लेता है, वैसे ही कोई भी ‘स्क्रिप्ट’ देखते ही आप उसकी अशुद्धियाँ पकड़ लेते हैं। इसमें भी खास बात यह कि अशुद्धियाँ दूर करने के लिए आपकी कलम भी चल पड़ती है- बिना किसी अपेक्षा के।

यहाँ यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि प्रायः हम सभी आपसी व्यवहार में यह देखते हैं कि हम वही बात कहें, जो सामने वाले को प्रिय लगे। अक्सर बड़े-बड़े विद्वान भी वैसी सलाह देना पसंद करते हैं, जो आपको प्रिय लगे। सलाह देते हुए गुरू एवं वैद्य भी ‘प्रेय’ को देखते हैं, ‘श्रेय’ को नहीं- आपको ‘इंजेक्शन’ लेना पसंद नहीं है, तो ‘टेबलेट’ ले लीजिए स्टाइल में।

लेकिन यह एक सुखद आश्चर्य है कि डाॅ. मिश्र ऐसे दुनियावी विद्वानों से अलग हैं। आपकी एक बड़ी विशेषता है कि आप ‘प्रेय’ को नहीं, ‘श्रेय’ को महत्व देते हैं। आप हमेशा वही सलाह देते हैं, जो सामने वाले के लिए हितकारी हो, भले ही वह कड़वी ही क्यों न लगे। सच्चे गुरू एवं सच्चे वैद्य का यही काम है!

इधर, जून 2017 से मैं भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा की सेवा में आ गया हूँ। लेकिन आज भी मैं अपनी वैचारिक खुराक एवं भाषायी स्वास्थ्य के लिए अपने ‘मानस गुरू’ एवं ‘भाषायी वैद्य’ डाॅ. मिश्र पर निर्भर हूँ। आज भी किसी प्रकार की कठिनाई होने पर मैं कोई ‘पुस्तक’ या ‘शब्दकोश’ उलटने-पलटने की बजाय डाॅ. मिश्र को फोन करना पसंद करता हूँ। डाॅ. मिश्र मेरे लिए ‘जीवंत पुस्तकालय’ हैं! ईश्वर से प्रार्थना है कि वे हमेशा स्वस्थ, प्रसन्न एवं सक्रिय रहें और उनकी यश, कीर्ति एवं ख्याति दूर-दूर तक फैले!!

– *डाॅ. सुधांशु शेखर*
असिस्टेंट प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, दर्शनशास्त्र विभाग, ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा (बिहार)
मोबाइल-9934629245, ई. मेल- [email protected]

bnmusamvadhttps://bnmusamvad.com
B. N. Mandal University, Madhepura, Bihar, India

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